कुंभकरण का जीवन परिचय | Kumbhkaran ka jivan parichay

कुंभकरण का जीवन परिचय

कुंभकरण का जीवन परिचय kumbhkaran's Biography

हैलो दोस्तों आपका इस लेख कुंभकरण का जीवन परिचय (Biography of kumbhkaran) में बहुत-बहुत स्वागत है। इस लेख में हम आपको कुंभकरण जो कि भाई प्रेम का सबसे बड़ा उदाहरण था के बारे में बताने जा रहे हैं।

इस पृथ्वी पर कई राक्षसों ने जन्म लिया जो बहुत ही विशाल शरीर और शक्तिशाली थे। उन्ही में से त्रेता युग का एक राक्षस था कुम्भकरण, तो जानते है, कुम्भकरण के बारे में कुम्भकरण का जीवन परिचय:-

दुर्वासा ऋषि कौन थे परिचय

कुंभकरण कौन था who was kumbhkaran 

रामायण में कई ऐसे पात्र हैं जिनकी शौर्य और पराक्रम की गाथा कही नहीं जा सकती ऐसे महारथी योद्धा हुये हैं जिन्होंने भगवान श्री राम के साथ बड़ी ही शूरवीरता के साथ युद्ध किया

जिनमें मेघनाथ अतिकाय आदि है रामायण का एक मुख्य पात्र कुंभकरण भी है। कुंभकरण विश्रवा और राक्षसी कैकसी का पुत्र था और साथ ही लंका के राजा रावण का छोटा भाई भी था।

इसका नाम कुंभकरण से तात्पर्य कुंभ मतलब "धड़ा" और कण॔ मतलब "कान" से है। बचपन से ही बहुत बड़े कान होने के कारण उनका नाम कुंभकर्ण रखा गया था।

कुंभकरण, विभीषण और सूर्पणखा के बड़े भाई थे।इतना बलवान होने के बाद भी उसने कभी अपने भाई का विरोध नहीं किया क्योंकि वह अपने भाई से अधिक प्रेम करता था।

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कुंभकरण और रावण के पास अपार शक्तियाँ थी परंतु विभीषण के पास किसी प्रकार की शक्ति नहीं थे, क्योंकि वह अपने पिता के संगत में ही रहते थे और भगवान के एक बहुत ही सच्चे भक्त बन गए थे।

कुंभकरण इतना बड़ा था कि उसका भोजन पहुँचाने के लिए सीढ़ियों से चढ़कर उसके पास जाना पड़ता था। वह एक बार मैं कई गाँव का खाना अकेले खा जाता था।

कुम्भकरण का असली नाम क्या है kumbhkaran ka asli naam kya hai 

कुम्भकरण जिसका नाम सुनते ही धरती आकाश थर - थर कांपने लगते थे, जो विश्व विजेता लंकापति रावण का भाई था। वास्तव में वह राक्षस नहीं था।

कुम्भकरण तो श्रीहरि विष्णु का ही एक द्वारपाल था, जो सनन्दन ऋषियों के श्राप के कारण राक्षस बना था। इस प्रकार कुम्भकरण का असली नाम विजय था, जो श्री हरि विष्णु का सेवक और द्वारपाल था। 

कुम्भकरण का वरदान और अभिशाप Boon or curse of kumbhkaran 

बचपन से ही कुंभकरण बहुत ही बलवान था कि वह एक बार में बहुत सा भोजन खाता था जितना कि कई नगरों के लोग नहीं खा पाते थे। कुंभकरण की इच्छा थी कि वह स्वर्ग पर राज करे क्योंकि वहाँ उसे संपूर्ण जीवन पेट भर खाना मिल सकता था

कुंभकरण देखने में ही बहुत ही ज्यादा बलवान और भीमकाय था। कुंभकरण ने जब अपनी तपस्या शुरू की तब पूरे देवलोक में चिंता का विषय खड़ा हो गया कि अगर कुम्भकरण स्वर्गलोक माँग लेगा तो अनर्थ हो जायेगा इसलिए 

सभी देवताओं ने माँ सरस्वती से प्रार्थना की कुंभकरण जब वरदान मांगे तो आप उसकी जीव्ह पर बैठ जाएँ तथा इन्द्रासन को निद्रासन में बदल दें।

कुम्भकरण कि तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने वरदान मांगने को कहा जब कुंभकरण ने वरदान में इंद्रासन माँगना चाहा तो माँ सरस्वती कुम्भकरण की जिव्हा पर बैठ गयी और उसके मुख से निंद्रासन निकल गया,

जिसे सुनकर ब्रह्मा जी तुरंत तथास्तु कह पूरा कर दिया बाद में कुंभकरण को इसका पश्चाताप हुआ तो ब्रह्मा जी ने इसकी अवधि काम करके कहाँ की तुम 6 महीने तक सोते रहोगे और 

1 दिन जागकर फिर 6 महीने महीने के लिए सो जाओगे, परंतु अगर किसी ने बलपूर्वक उठाने की कोशिश की तो उस दिन तुम्हारा अंतिम दिन होगा।

कुंभकरण की पत्नी कौन थी who was wife of kumbhkaran 

भारत कोश के परिणाम स्वरूप कुंभकरण का विवाह विरोचन की बेटी व्रज्रज्वाला से हुआ, इसके अलावा करकटी भी उसकी पत्नी थी। कुंभकरण ने पर्वत पर रहने वाले एक महिला से विवाह किया था,

जिसके कुछ समय पश्चात उससे कुंभकरण को एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम भीम रखा था। जब राम ने कुंभकरण का वध किया तब माता करकटी ने भीम को खुद से अलग रखने का निर्णय लिया था।

जब भीम बड़ा हो गया तब उसने अपने माता करकटी से अपने पिता कुंभकरण की मृत्यु का कारण पूछा तब उसने देवताओं से बदला लेने की ठानी और कठोर तपस्या करने लगा, जिससे वह काफी बलवान भी हो गया।

कुंभकरण की लंबाई और वजन कितना था waight and height 

कुम्भकरण ही एक ऐसा राक्षस था जो हिमालय की तरह लम्बा और मोटा था। कुंभकरण की लंबाई छह सौ धनुष और मोटाई सौ धनुष थी। कुंभकरण की आँखें गाड़ी के पहियों के जैसे बड़ी बड़ी थी।

कुंभकरण इतना बड़ा था कि वह अपनी हथेलियों पर लोगों को खड़ा कर लेता था। लोगों को उससे बात करने के लिए सीढ़ियाँ चढ़कर उसके पास जाकर बातें करनी पड़ती थी।

कुंभकरण का वध Kumbhkaran,s death 

जब राम और रावण युद्ध चल रहा था और स्वयं रावण राम की टक्कर नहीं ले पाया तथा रावण की सेना की भी क्षति हो गई थी तब रावण ने कुंभकरण का सहारा लिया और उसने कुंभकरण को जगाने का आदेश दिया

क्योंकि कुंभकरण का अभी सोने का समय था इसलिए उसे जगाने में बहुत मेहनत करनी पड़ी यही कारण था कि कुंभकरण का वध हुआ

कुम्भकरण इतना शक्तिशाली और शक्तियों से परिपूर्ण था कि उसका वध करना बड़ा मुश्किल था। कुंभकरण के द्वारा रावण को समझाया गया की श्रीराम नारायण का अवतार है और जिसका तुमने हरण किया हुआ है साक्षात लक्ष्मी देवी का अवतार है

लेकिन अपने भाई की आज्ञा और भाई प्रेम के कारण वह स्वयं भगवान विष्णु से लड़ने के लिए गया और उसने युद्ध स्थल में जाते ही श्री राम की सेना में हाहाकार मचा दिया उसके बड़े-बड़े पैरों के नीचे

वानर भालू दब के मरने लगे उसने अंगद, नल, नील सभी को पराजित कर दिया तथा हनुमान जी ने युद्ध किया हनुमान जी के बल तथा युद्ध कौशल से प्रसन्न होकर उन्होंने हनुमान जी को छोड़ दिया

किन्तु महाराज सुग्रीव को बंदी बना लिया तथा श्रीराम को ललकारा अपने राजा को बंदी देख वानर सेना का मनोबल टूटने लगा

अंततः भगवान श्रीराम युद्धस्थलल पर आ गए और भयंकर युद्ध शुरू हो गया दोनों तरफ से बड़े-बड़े विनाशकारी अस्त्र-शस्त्र चलाए जा रहे थे।

युद्ध कई दिनों तक चला अंततः भगवान श्रीराम ने कुंभकरण का हाथ काट दिया फिर दूसरा हाथ काट के सर को धड़ से अलग कर कुंभकरण को काल के मुँह में भेज दिया। इस प्रकार से एक निरपराध भाई अपने भाई प्रेम भ्रातआज्ञा के कारण मृत्यु को प्राप्त हुआ।

कुंभकरण के बारे में कुछ रोचक तथ्य Interesting fect about kumbhkaran 

  1. राक्षस होने के बाद भी कुम्भकरण एक ईमानदार (Honest) दयालु (kind) तथा ज्ञानवान (Wise) व्यक्ति था।
  2. कुंभकरण की इच्छा थी कि वह स्वर्ग पर राज करें किंतु वह ब्रह्मा जी से वरदान में इंद्रासन की जगह निद्रासन मांग बैठा। 
  3. कुंभकरण 1 दिन में पांच राज्यों का खाना अकेले ही खा जाता था।
  4. जब कभी कुंभकरण को जगाना होता था तो उसे केवल खाने की खुशबू के द्वारा ही जगाया जा सकता था।
  5. कुंभकरण के सोने के लिए एक अलग ही महल बनवाया गया था जिसकी लंबाई और चौड़ाई हिमालय पर्वत के समान थी।
  6. कुंभकरण समस्त वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता तथा शक्तिशाली इंसान था उस पर छोटे-मोटे अस्त्रों का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता था।

Note - इस लेख में आपने कुंभकरण का जीवन परिचय (Biography of Kumbhkaran) पड़ा यह पोस्ट आपको कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताइएगा तथा शेयर करना ना भूले

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