मुंशी प्रेमचंद की कहानी परीक्षा | Munshi Premchandra ki kahani Pareeksha

मुंशी प्रेमचंद की कहानी परीक्षा Munshi Premchandra ki kahani Pareeksha 

हेलो दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है, हमारे इस लेख मुंशी प्रेमचंद की कहानी परीक्षा (Munshi Premchand Ki Kahani Pareeksha) में

दोस्तों इस लेख में आप पढ़ेंगे मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी परीक्षा जो ईरानी बादशाह, नादिर शाह और दिल्ली के बादशाह की कहानी है।

ईरानी बादशाह नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया था, तो उस समय क्या स्थिति रही थी। वह स्थिति इस कहानी परीक्षा के माध्यम से बताई गयी है, तो आइए शुरू करते हैं, दोस्तों मुंशी प्रेमचंद की कहानी परीक्षा:-


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परीक्षा कहानी

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानी परीक्षा munshi Premchandra ki kahani Pareeksha  

यह कहानी उस समय की है, जब नादिरशाह ने दिल्ली में कत्लेआम कर रखा था। दिल्ली की गलियाँ खून से लथपथ हो गई थी। चारों तरफ लोग डरे सहमे हुए अपने घरों में चारदीवारी में बंद थे.

चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था, कहीं बाजार लूट रहे थे, तो कहीं किसी घर में आग लगी थी। कोई किसी की नहीं सुन रहा था। सबको अपनी जान बचाने के लाले पड़ रहे थे। रईसों की बैगमें घर से निकाली जा रही थी।

और उनको बहुत दुख झेलने पड़ रहे थे। इरानियों की रक्त पीने की इच्छा शांत ही नहीं हो रही थी। चारों तरफ क्रूरता कठोरता और पिशाचकता अपना भयंकर विशालतम रूप लिए हुए दिखाई दे रही थी

और इसी समय नादिरशाह ने शाही महल में प्रवेश किया दिल्ली उन दिनों भोग विलास का केंद्र थी। रईसों के घर में सौंदर्य की सभी प्रकार की वस्तुएं और बेशकीमती आभूषण थे।

उनकी बेगमें सजने सवरने में ही अपना समय व्यक्त करती थी। तो वहीं पुरुष भोग विलास में और शेरो शायरी में अपने दिन गुजार देते।

देश के प्रत्येक कोने कोने से धन खींचता था और लोग दिल्ली में आकर उसे पानी की तरह बहा देते थे। उस समय दिल्ली की वेश्याओं की भी चांदी ही चांदी थी।

कहीं पर तीतरों के जोड़े होते थे, तो कहीं पर बुलबुलों की पलिया सारा नगर निद्रा और विलास में ही डूबा रहता था। जैसे ही नादिरशाह महल में पहुंचा उसकी आंखें फटी की फटी रह गई।

शाही महल में विभिन्न प्रकार की कीमती वस्तुएं थी।नादिर शाह का जन्म गरीब परिवार में हुआ था और उसका अधिकतर समय रणभूमि में ही बीता था, उसका भोग विलास में मन ही नहीं लगता था

शाही महल में जिधर भी देखता उधर उसकी आंखें नहीं उठती थी। संध्या हो गई थी और नादिरशाह शाही महल की सभी कीमती चीजों को देख रहा था और बेशकीमती चीजों को इकट्ठा भी कर रहा था।

सारी बेशकीमती चीजें को इकट्ठा करता हुआ नादिर शाह दीवाने खास में पहुंचा और करचोबी मनसद पर बैठ गया। नादिरशाह ने अपने सभी

सरदारों को वहाँ से जाने का आदेश दिया और अपने सभी हथियार रख दिए तथा महल के दरोगा को हुक्म दिया, कि वह शाही दरबार की बेगमों का नाच

देखना चाहता है। तुम अभी उन्हें सुंदर वस्त्र और आभूषण पहना कर यहाँ पर उपस्थित करो और हाँ ध्यान रखें मैं कोई उज्र या इनकार नहीं सुन सकता।

दरोगा ने यह नादिरशाह का हुक्म सुना तो हक्का-बक्का रह गया, जिन महिलाओं पर सूर्य की धूप भी नहीं पडी थी। वह कैसे इस मजलिस में आएंगी?

और नाचने की तो बात दूर ही है। शाही बेगमों का इतना अपमान तो कभी भी नहीं हुआ था। नर पिशाच ने दिल्ली को खून से रंग दिया फिर भी इसका

चित् शांत नहीं हुआ, किंतु नादिरशाह के सामने एक शब्द मुख् से निकालना आग में कूदने के बराबर था। दरोगा सिर झुका कर आदाग लाया और रनिवास में जाकर शाही बेगमों को नादिरशाही हुक्म सुना दिया

और इसके साथ ही यह भी इत्तला कर दिया कि जरा सी ताम्मुल ना हो नादिरशाह कोई उज्र या हिला नहीं सुनेगा।शाही खानदान पर इतनी बड़ी विपत्ति कभी नहीं

आई थी, किंतु उस समय विजयी बादशाह की आज्ञा शिरोधार्य करने के सिवा और कोई भी मार्ग नहीं था। जब शाही बेगोमों ने यह आज्ञा सुनी

तो वे अचंभित रह गई पूरे रनिवास में मातम सा छा गया, पूरी चहल-पहल गायब हो गई। आंखों से अश्रु की धाराएँ बहने लगी किसी ने खुदा तो किसी ने रसूल का

सुमिरन किया। किंतु उनमें से कोई ऐसी नहीं थी। जिसने कटारे तलवार उठाई हो, जबकि कितनी ही बेगमों की नसों में राजपूताना का रक्त दौड़ रहा था।

किंतु इंद्रीयलिप्सा ने जोहार की उस आग को भी ठंडा कर दिया कियोकि सुख भोग की लालसा आत्मसम्मान को नष्ट कर देती है।

आपस में सलाह करके आत्म रक्षा करने का उपाय सोचने का वक्त ही नहीं था। प्रत्येक पल भाग्य का इंतजार कर रहा था

और हताश होकर सभी लपलाओ ने पापी के सम्मुख जाने का निश्चय कर लिया। आंखों से आंसू निकल रहे थे और इन अश्रुपूरित आंखों में सुरमा लगाया जा रहा था।

कोई अपनी मांग में मोति गूथ रही थी, तो कोई अपने बालों को संभाल रही थी, किंतु किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं थी,

कि वह इस आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस कर सके। एक घंटा भी नहीं हुआ था, कि सभी बेगमें आभूषणों से जगमगाती हुई।

अपने मुख पर कांति गुलाब को ले जाती और सुगंध की लपटें उड़ाती हुई नादिरशाह के सामने उपस्थित हो गई।नादिरशाह ने परियों के इस दल को देखा

और टेक लगाकर लेट गया अपनी तलवार और कटार भी उसने सामने रख दिए और कुछ ही देर में उसकी आंखें झपकने लगी।

उसने एक अंगड़ाई लेकर अपनी करवट बदल ली और थोड़ी देर में उसके खर्राटे की आवाज पूरे कमरे में गूंज उठी। ऐसा प्रतीत हो रहा था,

कि वह गहरी निद्रा में सो गया है, और करीब आधे घंटे तक नादिरशाह ऐसा ही सोता रहा और सभी बेगमें सिर नीचा किए हुए दीवार पर चित्र की भांति खड़ी रही

जिनमें से एक दो ढीठ महिलाएँ कानाफूसी कर रही थी। कितना भयंकर स्वरूप है, कितनी रणोंमात आंखें हैं. कितना भारी शरीर है। यह तो एक देव के समान दिखाई देता है। 

अचानक नादिर शाह की आंखें खुल गई और उसे जागते देख सभी बेगमों ने अपनी आंखें नीचे कर ली। सभी ने अपने अंग समेट लिए और मन ही मन सोचने लगी

कि अब यह नाचने को कहेगा अब कितनी जिल्लत सहनी पड़ेगी। यह हमसे ना होगा चाहे जान ही क्यों ना चली जाए।

तभी नादिरशाह ऊँची आवाज में बोला है! हे खुदा की बंदियों मैंने तुम्हारा इम्तहान लेने के लिए ही तुम्हें यहाँ बुलाया था और अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है। 

तुम्हारी निस्बत मेरा जो गुमान था। वह सच निकला जब किसी कौम की औरतों में गैरत नहीं रहती तो वह मुर्दा हो जाती है। मैं यह देखना चाहता था,

कि अभी तुम्हारे अंदर वह गैरत मौजूद है या नहीं इसलिए मैंने तुम्हें यहाँ बुलाया था। मैं तुम्हारी बेहुरमली नहीं करना चाहता था

और मैं ऐश का बंदा भी नहीं हूँ वरना आज भेड़ों के गले चराता होता। मैं इतना हवस्परखत भी नहीं हूँ वरना आज फारस में सरोद और सितार की ताने सुना रहा होता।

मुझे सिर्फ तुम्हारा इंतिहान लेना था और मुझे यह देख कर ममाल हो रहा है, कि तुममें अब गैरत बाकी नहीं रह गई। क्या यह मुमकिन नहीं था

कि तुम मेरे आदेश को पैरों तले कुचल देती मैंने तुम्हें एक और मौका दिया था। जब में नींद में था क्या यह मुमकिन नहीं था कि तुम में से कोई एक खुदा की बंदी कटार उठाकर मेरे सीने में चुभा देती।

अगर किसी ने भी मुझे मारने के लिए कटार उठा ली होती तो मुझे बहुत खुशी होती है मैं उन नाजुक हाथों के सामने अपनी गर्दन झुका देता।

लेकिन अफसोस तैमूरी खानदान की एक भी बेटी ऐसी नहीं निकली जो अपनी हर मत बिगाड़ने पर हाथ उठाती अब यह सल्तनत जिंदा नहीं रह सकती।

इसकी हसती के दिन खत्म हो गए हैं। तुम लोग जाओ और अपनी सल्तनत को बचाओ वरना इसी प्रकार से हवस की गुलामी करते हुए इस दुनिया से रुखसत हो जाओगी।

दोस्तों आपने इस लेख में मुंशी प्रेमचंद्र की कहानी परीक्षा (Munshi Premchandra ki kahani Pareeksha) पढ़ी आशा करता हूँ, यह लेख आपको अच्छा लगा होगा कृपया इसे शेयर जरूर करें।

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