शूर्पणखा की कहानी तथा अर्थ Story and Meaning of Shurpanakha

हैलो दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है।. इस लेख शूर्पणखा की कहानी तथा अर्थ Story and Meaning of Shurpanakha में।

दोस्तों इस लेख में हम रामायण की एक प्रमुख पात्र शूर्पणखा की कहानी लेकर आये है, इसके साथ ही आप शूर्पणखा कौन थी,

सूर्पणखा की माता का नाम शूर्पणखा का असली नाम के साथ अन्य कई महत्वपूर्ण तथ्यों से अवगत होंगे। तो दोस्तों आइये शुरू करते है, यह लेख शूर्पणखा की कहानी तथा अर्थ:-

शूर्पणखा की कहानी तथा अर्थ

शूर्पणखा कौन थी who was Shurpanakha

शूर्पणखा महर्षि पुलत्स्य के पुत्र ऋषि विश्रवा तथा राक्षस सुमाली तथा तड़का की पुत्री कैकसी की पुत्री थी। शूर्पणखा का राक्षसी स्वभाव उसकी माता कैकसी के कारण हुआ।

शूर्पणखा के तीन भाई भी थे जिनमें दो राक्षस प्रवृति के रावण और कुम्भकरण तथा एक ऋषि प्रवृति का विभीषण था।

विभीषण का स्वभाव महर्षि विश्रवा के समान था। इसलिए रावण, कुम्भकरण, शूर्पणखा सहित कैकसी भी विभीषण से धृणा करती थी।

शूर्पणखा के पास कई मायावी शक्तियाँ थी, जिससे वह उड़ सकती थी, इक्षा अनुसार रूप बदल सकती थी।

कैकसी का जीवन परिचय

शूर्पणखा की कहानी तथा अर्थ

सूर्पनखा की माता का नाम name of Shurpanakha's mother 

सूर्पनखा की माता का नाम कैकसी था जो राक्षस सुमाली तथा तड़का की पुत्री थी। इस कारण वह अपनी माँ कैकसी की तरफ से राक्षस कन्या थी।

जबकि सूर्पनखा के पिता का नाम ऋषि विश्रवा था। जो ऋषि पुलत्स्य के पुत्र थे। इस लिए पिता ऋषि विश्रवा की तरफ से वह एक ऋषि कन्या थी।

किन्तु शूर्पणखा पर अपनी माँ के स्वभाव का प्रभाव अधिक पड़ा जिससे वह राक्षसी बन गई।

रावण का असली नाम क्या था

शूर्पणखा का असली नाम क्या था real name of Shurpanakha 

शूर्पणखा का असली नाम मीनाक्षी था। कियोकि शूर्पणखा की आंखे मछली के समान थी। शूर्पणखा बचपन से ही चालक तथा बुद्धिमान होने के साथ सुन्दर भी थी।

शूर्पणखा का विवाह दैत्य राक्षस कालिकेय के पुत्र विद्युतजीव्ह से हुआ था। जो रावण के समान ही बलशाली तथा मायावी विधाओं में पारंगत था। विद्युतजीव्ह तीनों लोकों पर राज्य करना चाहता था। 

किन्तु रावण और विद्युतजीव्ह के बीच तीनों लोकों का अधिपति बनने की बात पर युद्ध हुआ तो उस युद्ध में रावण ने अपने बहिन के पति विद्युतजीव्ह का वध कर दिया। 

शूर्पणखा का अर्थ meaning of Shurpanakha

शूर्पणखा का वास्तविक नाम शूर्पणखा नहीं था। उसका  वास्तविक नाम था। मीनाक्षी क्योंकि उसकी आंखें मीन के समान अर्थात मछली के समान थी।

किंतु मीनाक्षी के नाखून राक्षसों की भांति बड़े-बड़े शूप के सामान और नुकीले थे। इसलिए मीनाक्षी का नाम सूर्पनखा हो गया।

शूर्पणखा का अर्थ होता है, बड़े-बड़े नाखून धारण करने वाली स्त्री। अर्थात बड़े-बड़े शूप के समान नाखून रखने वाली को शूर्पणखा कहते है। 

शूर्पणखा की कहानी story of Shurpanakha

राक्षसी प्रवृत्ति वाली सूर्पनखा महर्षि विश्वा और राक्षसी कैकसी की पुत्री थी। जिसका विवाह दैत्य कालिकेय के पुत्र विद्युतजीव्ह के साथ हुआ था।

विद्युतजीव्ह रावण की तरह ही शक्तिशाली मायावी था। किन्तु असुर साम्राज्य का अधिपति बनना चाहता था। लेकिन रावण को यह बात पसंद नहीं आई

और रावण तथा कालिकेय के बीच में युद्ध आरंभ हो गया दोनों ओर से मायावी शक्तियों और तथा अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग किया गया और मायावी युद्ध हुआ.

किंतु अंत में राक्षस राज रावण ने कालिकेय के पुत्र विद्युतजीव्ह का वध कर दिया जिसकी खबर शूर्पणखा को मिली कि उसके पति की मृत्यु उसके भाई रावण ने ही कर दी है।

तब सूर्पनखा अति क्रोधित हो गई और उसने उसी समय प्रतिज्ञा की वह रावण के संपूर्ण विनाश का कारण बनेगी। रावण ने भी अपनी बहन सूर्पनखा को समझा कर

खर और दूषण के पास रहने के लिए दंडकारण्य वन में भेज दिया। उसी समय दंडकारण्य वन में भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ रह रहे थे।

एक बार सूर्पनखा दंडकारण्य वन में विचरण कर रही थी। तभी उसकी दृष्टि भगवान श्रीराम पर पड़ी। भगवान श्री राम का रूप सौंदर्य देखकर वह उन पर मोहित हो गई

और कामवासना से प्रेरित होकर उनके समक्ष सुंदर मोहिनी रूप में प्रकट होकर विवाह की इच्छा करने लगी। किंतु भगवान श्रीराम ने कहा कि वह पहले से ही विवाहित हैं

और एक विवाह के पश्चात दूसरा विवाह नहीं कर सकते। तब वह उनके भाई लक्ष्मण के पास गई किन्तु लक्ष्मण ने भी उसके इस अनुरोध को ठुकरा दिया

जिससे सूर्पनखा आक्रमक होकर सीता पर आक्रमण कर बैठी। तभी लक्ष्मण ने तलवार से सूर्पणखा की नाक काट दी।

सूर्पनखा अपनी दुर्दशा देखकर तुरंत महाराज रावण की भरी सभा में पहुंची और अपना प्रतिशोध लेने के लिए रावण को भड़काने लगी।

जिससे रावण ने माता सीता का छल से हरण कर लिया। इसके बाद भगवान श्रीराम ने वानर सेना के साथ रावण सहित समस्त दैत्य राक्षसों का वध कर दिया इस प्रकार से सूर्पनखा ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की।

सूर्पनखा की पूर्व जन्म की कहानी previous birth story of Shurpanakha

सूर्पनखा त्रेता युग में राक्षसी प्रकृति की अनीति, अत्याचार पर चलने वाली एक महिला थी। किंतु वह राक्षसी बनने से पहले एक अप्सरा भी थी। वास्तव में सूर्पनखा इंद्रलोक की एक अप्सरा थी।

जिसका नाम था "नयनतारा" नयनतारा को भी इंद्रलोक में रंभा मेनका आदि के समान सम्मान प्राप्त था। और वह भगवान इंद्र की सबसे प्रिय अप्सराओं में से एक थी।

एक बार पृथ्वी लोक पर बज्रा नामक ऋषि घोर तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या के प्रभाव से तीनों लोको में हलचल उत्पन्न हो गई। जिससे देवराज इंद्र को अपना इंद्रासन खोने का भय सताने लगा

और उन्होंने अप्सरा नयनतारा को बुलाया और कहा की ऋषि बज्रा की घोर तपस्या के कारण तीनों लोकों में भयंकर भूचाल उत्पन्न होने लगा है।

शायद वह इंद्रलोक के अधिपति बनने के लिए ही यह तपस्या कर रहे हैं। इसलिए में तुम्हें आदेश देता हूँ। तुम जाकर बज्रा ऋषि की तपस्या को भंग करो.

इंद्रदेव का आदेश पाकर नयनतारा उस स्थान पर पहुँची जहाँ ऋषि बज्रा तपस्या कर रहे थे। नयनतारा की शक्तियों और सौंदर्य के कारण बज्रा ऋषि की तपस्या भंग हो गई।

किंतु उन्होंने अप्सरा नयनतारा को एक भयंकर श्राप दे दिया और कहा तुमने मेरी जो तपस्या भंग करने का दुस्साहस किया है।

इसके लिए तुम राक्षस योनि को प्राप्त करोगी। यह सुनकर नयनतारा ऋषि के चरणों में गिर पड़ी और हाथ जोड़कर बोली हे ऋषि इसमें मेरी कोई गलती नहीं है।

में तो अपने स्वामी इंद्रदेव के आदेश पर आपकी इस तपस्या को भंग करने के लिए आई थी। मेरा इसमें कोई दोष नहीं है। मुझे क्षमा कर दीजिए।

नयनतारा के अनुनय विनय के बाद ऋषि बज्रा के हृदय में दया उत्पन्न हो गई और उन्होंने कहा कि मेरा दिया गया श्राप वापस तो नहीं होगा।

किंतु तुम्हें राक्षसी रूप में ही भगवान विष्णु रुपी श्री राम के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। नयनतारा ऋषि बज्रा को प्रणाम करके वापस इंद्रलोक में आ गई

और उन्होंने देवराज इंद्र को समस्त घटना के बारे में अवगत कराया। तब भगवान इंद्रदेव ने उन्हें अप्सरा स्वरूप त्याग कर कैकसी और महर्षि विश्वा की पुत्री के रूप में जन्म लेने के लिए कहा।

इस प्रकार से नयनतारा अप्सरा शूर्पणखा राक्षसी के रूप में उत्पन्न हुई। किंतु उसके मन में भगवान श्रीराम से विवाह करने की इच्छा जागृत हो गई।

तथा अपनी प्रतिज्ञा के कारण उसने राक्षस राज रावण सहित कई देत्यों के वध का कारण बनी। राक्षस राज रावण के वध के पश्चात सूर्पनखा ने भगवान श्रीराम की तपस्या प्रारंभ कर दी।

भगवान श्रीराम ने प्रसन्न होकर शूर्पणखा को दर्शन दिए और कहा जब तुम द्वापर युग में कुब्ज़ा के रूप में जन्म लोगी उस युग में मैं तुम्हारा कल्याण करूंगा। 

दोस्तों इस लेख में आपने शूर्पणखा कौन थी (Story of Shoorpnakha) शूर्पणखा की कहानी पढ़ी. आशा करता हूँ, यह लेख आपको अच्छा लगा होगा। 

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