रामधारी सिंह दिनकर पर निबंध Essay on Ramdhari singh dinkar

रामधारी सिंह दिनकर पर निबंध

रामधारी सिंह दिनकर पर निबंध Essay on Ramdhari singh dinkar 

हैलो दोस्तों आपका बहुत बहुत स्वागत है, इस लेख रामधारी सिंह दिनकर पर निबंध में। दोस्तों इस लेख में आप रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय रचनाएँ भाव पक्ष,

कला पक्ष के साथ ही रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य में स्थान के बारे में पड़ेंगे। तो आइये दोस्तों करते है शुरू यह लेख रामधारी सिंह दिनकर पर निबंध:-

रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय

रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय jivan parichay of Ramdhari singh dinkar 

रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के प्रसिद्ध कवि तथा क्रांतिकारी गीतों के गायक लेखक तथा विद्रोही कवि कहे जाते थे।

जिनका जन्म भारत देश के राज्य बिहार 1908 में मुंगेर जिले में स्थित एक छोटे से गांव सिमरिया में हुआ था। रामधारी सिंह दिनकर के पिता का नाम रवि सिंह तथा माता का नाम मनरूपा देवी था।

रामधारी सिंह दिनकर के पिता एक साधारण व्यक्ति थे। किंतु उनके जीवन में राष्ट्रप्रेम, देशभक्ति, दया, करुणा जैसे गुण अधिक देखने को मिलते थे।

और यही गुण अपने पिता से प्राप्त किए रामधारी सिंह दिनकर ने। रामधारी सिंह दिनकर जी की प्रारंभिक शिक्षा जन्मभूमि पर संपन्न हुई।

रामधारी सिंह दिनकर ने अपना अध्ययन बड़ी ही लगन और मेहनत के साथ किया। इसलिए वह हिंदी और अंग्रेजी के साथ ही संस्कृत उर्दू और बंगला के भी अच्छे विद्वान कहे जाते थे।

रामधारी सिंह दिनकर ने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास और राजनीति शास्त्र में बी. ए.पास किया और एक अध्यापक की नौकरी ज्वाइन कर ली।

अपनी ईमानदारी कर्तव्यनिष्ठा तथा कार्य के प्रति समर्पण होने के कारण उन्होंने विभिन्न विभागों में अपनी सेवाएँ दी। रामधारी सिंह दिनकर 1934 से 1947 तक सब रजिस्टार के रूप में कार्यरत रहे।

1950 से 1952 तक उन्होंने प्रचार विभाग के उप निदेशक पद पर काम किया। इसके बाद वे भागलपुर कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष तथा कुछ समय पश्चात भागलपुर विश्वविद्यालय के उप कुलपति नियुक्त हुए।

रामधारी सिंह दिनकर ने आजाद भारत के हिंदी सलाहकार के रूप में भी कार्य किया। रामधारी सिंह दिनकर 1952 में राज्यसभा के सदस्य चुने गए और लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे।

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रामधारी सिंह दिनकर की रचनाएँ Composition of Ramdhari singh dinkar 

रामधारी सिंह दिनकर का जन्म उस समय हुआ था, जब भारत देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और चारों और स्वतंत्रता की मांग उठ रही थी।

इसलिए रामधारी सिंह दिनकर में देशभक्ति, देश प्रेम और क्रांतिकारी की भावना उत्पन्न हुई। तथा उन्होंने अपनी रचनाओं में वीरों के लिए क्रांति गीत वीर रस से सम्बंधित रचनाएँ लिखी।

रामधारी सिंह दिनकर की रचनाएँ एक तरफ समाज सुधार तथा समाज में व्याप्त अनीति और अत्याचार के खिलाफ थी तो वहीं दूसरी तरफ उनकी रचनाओं में श्रृंगार, मानवीय प्रेम की आभा भी झलकती है। रामधारी सिंह दिनकर की प्रमुख रचनाएँ निम्न प्रकार से हैं:-

रश्मिरथी (1952), परशुराम की प्रतिज्ञा (1963) वीर रस की प्रमुख रचनाएँ हैं, जिनसे देश के वीर सपूतों में साहस और जोश उत्पन्न करने वाले शब्दों का प्रयोग किया गया है।

उर्वशी (1974)रामधारी सिंह दिनकर की एक प्रसिद्ध रचना है जो एक, स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी के जीवन पर आधारित है। रचना में मानवीय प्रेम, वासना आदि का समायोजन देखने को मिलता है।

रामधारी सिंह दिनकर की रचना कुरुक्षेत्र (1946) भी अत्यंत प्रसिद्ध रचना है, जो महाभारत के पद चिन्हों पर रचित है।

वही संस्कृति के चार अध्याय (1956) के द्वारा रामधारी सिंह दिनकर ने भारतवासियों की सोच संस्कृति और विविधताओं के अलग होते हुए भी एक जैसी बताई है।

इसके अलावा भी रामधारी सिंह दिनकर कि कई प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। जो आज भी अपना एक अलग ही महत्व रखती हैं।

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रामधारी सिंह दिनकर का भाव पक्ष 

रामधारी सिंह दिनकर जी मानवता राष्ट्रीयता और एक क्रांतिकारी कवि होने के साथ ही प्रेम के भी कवि हैं। जहाँ एक तरफ उनकी रचनाओं में अतीत के प्रेम की भावना झलकती है।

तो वहीं वर्तमान स्थिति की दशाओं को देखते हुए उनके स्वर विद्रोही और चुनौती से परिपूर्ण हो जाते हैं। समाज में फैली विभिन्न

अराजक्ताओं को देखते हुए रामधारी सिंह दिनकर ने अपने काव्य के माध्यम से अराजकताओं जैसे जनता का शोषण उत्पीड़न

आदि की घोर निंदा की है। उनके काव्य में एक तरफ मजदूरों की दशा तथा दूसरी तरफ उच्च वर्ग के लोगों द्वारा किसानों का शोषण किस प्रकार किया जा रहा है,

का चित्रण देखने को मिलता है। ऐसी स्थितियों से प्रेरित होकर उन्होंने विभिन्न प्रकार की वीर रस से युक्त रचनाएँ लिखी है।

उनकी कविताओं में गरीबों के लिए सहानुभूति होती है, वहीं उच्च वर्ग के लोगों के लिए रोश, क्रोध भी दिखाई देता है। रामधारी सिंह दिनकर के काव्य में वीर रस की अधिक प्रधानता है।

रामधारी सिंह दिनकर का कला पक्ष

रामधारी सिंह दिनकर हिंदी भाषा के कवि हैं, उनकी अधिकतर रचनाएँ खड़ी बोली में ही मिलती हैं। रामधारी सिंह दिनकर की भाषा में प्रसाद और ओज गुण की प्रधानता मिलती है।

उनकी समस्त रचनाओं में स्वाभाविक रूप से उपमा, रूपक, विरोधाभास, संदेह और दृष्टांत अलंकारों का प्रयोग किया गया है। रामधारी सिंह की रचनाओं में मानवीकरण, ध्वन्यार्थ, व्यंजना शक्ति की प्रधानता है।

उन्होंने अपनी भाषा में छंद विधान भाषानुकूल और संरचनाओं में दोनों प्रकार की छंद शैलियों मुक्तक छंद और प्रबंध छंद का प्रयोग किया है। 

रामधारी सिंह दिनकर की काव्यगत विशेषताएँ 

रामधारी सिंह दिनकर हिंदी साहित्य के एक प्रसिद्ध कवि रचनाकार, निबंधकार तथा लेखक माने जाते हैं। रामधारी सिंह दिनकर को स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व विद्रोही कवि कह कर बुलाया जाता था

रामधारी सिंह दिनकर अपने काव्य के माध्यम से देशवासियों में विद्रोह की भावना उत्पन्न करते थे। क्योंकि रामधारी सिंह दिनकर की जो रचना हुआ करती थी,

वह रचना ओज गुण वीर रस और विद्रोह के शब्दों द्वारा रचित हुआ करती थी। रामधारी सिंह दिनकर ने एक तरफ अपनी साहित्यिक रचनाओं में समाज में उत्पन्न विभिन्न प्रकार की अनियमितताएँ

जैसे कि गरीब वर्ग को शताना उच्च वर्ग के द्वारा गरीबों का शोषण आदि को समाहित किया तो वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रेम और माधुर्य से ओतप्रोत रचनाएँ लिखी।

रामधारी सिंह दिनकर की बहुत ही रचनाएँ प्रेम,सौंदर्य, कोमलता आदि को दर्शाती हैं। तो वह कुछ रचनाएँ विद्रोह, हिम्मत, साहस का भी समर्थन करती हैं।

रामधारी सिंह दिनकर को दिए गए सम्मान

रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के एक अमर क्रांतिकारी कवि माने जाते हैं, जिन्होंने भारत देश के क्रांतिकारियों के लिए विभिन्न प्रकार के क्रांति गीत लिखे।

जिससे क्रांतिकारियों में जोश और कर्तव्य के प्रति समर्पण और त्याग की भावना प्रज्वलित हुई। रामधारी सिंह दिनकर को विभिन्न रचनाओं के लिए कई प्रकार के पुरस्कारों और सम्मान से सम्मानित किया गया है।

रामधारी सिंह दिनकर की रचना कुरुक्षेत्र के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश के काशी नागरी प्रचारिणी धर्म सभा तथा भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया गया।

1959 में उन्हें संस्कृति के चार अध्याय के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के द्वारा पदम विभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

रामधारी सिंह दिनकर को 1972 में उनकी कृति उर्वशी के लिए हिंदी का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। इसके बाद भी रामधारी सिंह दिनकर को

कई छोटे-बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया गया तथा उनके मरणोपरांत भारत सरकार ने उनके नाम पर 1999 में एक डाक टिकट जारी किया। 

रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य में स्थान

रामधारी सिंह दिनकर हिंदी साहित्य के एक महान प्रगतिवादी रचनाकार हैं। ओज गुण के प्रसिद्ध गायक और राष्ट्रीयता के परम भक्त कवि तथा रचनाकार माने जाने वाले रामधारी सिंह दिनकर

जिनकी वाणी में देश के लिए पीड़ा तथा देश के लोगों के लिए दया और करुणा समाहित है, ऐसे जागृति की मशाल लेकर चलने वाले सभी अर्थों में रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य में एक महत्वपूर्ण आदित्तीय और उल्लेखनीय स्थान है।

दोस्तों इस लेख में आपने रामधारी सिंह दिनकर पर निबंध पड़ा। आशा करता हुँ, यह लेख आपको अच्छा लगा होगा।

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