भगवान विष्णु का सातवाँ अवतार Bhagwan vishnu ka chhathvan avtar

भगवान विष्णु का सातवाँ अवतार Bhagwan vishnu ka saatvan avtar 

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख भगवान विष्णु का सातवाँ अवतार (God Vishnu ka Saatvan avtar) में। दोस्तों इस लेख में आप भगवान विष्णु के

छठवे अवतार की कथा पड़ेंगे, साथ ही यह जानेंगे की भगवान विष्णु का सातवाँ अवतार क्यों हुआ था। तो दोस्तों आइये पढ़ते है यह लेख भगवान विष्णु का सातवाँ अवतार:-

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भगवान विष्णु का सातवाँ अवतार

भगवान विष्णु का श्रीराम अवतार Bhagwan vishnu ka shriram avtar 

भगवान विष्णु का सातवाँ अवतार त्रेता युग में हुआ था। जिस समय धरती पर अत्याचार,अनीति तथा अधर्म का साम्राज्य चारों तरफ फैल गया था।

राक्षसों के भय से ऋषि मुनि जंगलों में छिपते फिर रहे थे, यज्ञ अनुष्ठान बंद हो गए थे, धरती पापी राक्षसों के अत्याचारों के कारण बेहाल हो गई थी,

उस समय भगवान विष्णु ने अयोध्यापति महाराजा दशरथ के घर श्रीराम के रूप में जन्म लिया जो भगवान विष्णु का छठवाँ अवतार कहलाता है।

भगवान विष्णु ने अपने सातवे अवतार में कई राक्षसों का वध करके पृथ्वी को राक्षसों से मुक्त कर दिया था। भगवान श्रीराम का जन्म अयोध्या पति महाराजा दशरथ के घर हुआ था उनकी माता का नाम कौशल्या देवी था।

राम की दो माताएँ और थी जिनका नाम कैकई और सुमित्रा था। भगवान श्रीराम के तीन भाई भरत लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे।

भगवान श्रीराम अपने तीनों भाइयों के साथ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में अध्ययन के लिए गए और तथा शीघ्र ही सभी विधाएँ सीख ली।

इसके बाद चारों भाई राजमहल में आकार रहने लगे तभी कुछ दिनों के बाद महर्षि विश्वामित्र महाराजा दशरथ के महल में पधारे तथा ताड़का

और उसके राक्षस बच्चों से ऋषि मुनियों की रक्षा करने के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को अपने साथ वन ले गए। जहाँ पर भगवान श्रीराम ने ताड़का

तथा सुबाहु का वध कर दिया और मारिची को सात समुंदर पार फेक दिया। भगवान श्रीराम ने पत्थर बनी अहिल्या का उद्धार किया तथा

जनकपुरी सीता स्वयंवर में पहुंचे। भगवान श्रीराम ने प्रसिद्ध शिव धनुष पर प्रत्यँचा चढाई और शिव धनुष तोड़कर माता सीता से नाता जोड़ा।

भगवान श्रीराम अपने चारों भाइयों के साथ अयोध्या में खुशी-खुशी जीवन यापन कर रहे थे। अयोध्या की प्रजा भी बहुत खुश थी।

किन्तु अयोध्या की प्रजा में उस समय खुशी की लहर दौड़ पड़ी जब महाराज दशरथ ने श्रीराम को राजा बनाने की घोषणा की।

परन्तु यह ख़ुशी मातम में बदल गई जब मंथरा के कहने पर महारानी कैकई ने महाराजा दशरथ को अपने दो वचनों के जाल में फांसकर भरत के लिए

अयोध्या का राजपाट तथा भगवान श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास माँगा।  भगवान श्रीराम, लक्ष्मण तथा सीता के साथ वन को चले गए।

भगवान श्रीराम के वियोग में महाराजा दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए। भगवान श्रीराम सरयू नदी पार करके चित्रकूट की और बढ़ गए जिसमें निशादराज ने उन्हें काफी सहायता की।

जब अयोध्या में भरत और शत्रुघ्न पहुंचे और उन्हें अपनी माँ कैकई की करनी ज्ञात हुई तो उनका ह्रदय छलनी - छलनी हो गया भरत ने माता कैकई को

कई कठोर वचन सुनाये। गुरु जी के कहने पर भरत तथा शत्रुघ्न ने अपने पिता महाराज दशरथ का अंतिम संस्कार किया। इसके बाद अयोध्या की सभा में

सभी मंत्रियों के सामने भरत ने राजगद्दी पर बैठने से मना कर दिया और श्रीराम को लाने के लिए वन चले गए। उनके साथ माताएँ गुरुजी तथा प्रजाजन भी थे।

उस समय भगवान श्रीराम माता सीता और लक्ष्मण के साथ चित्रकूट में रह रहे थे। यहीं पर भरत और भगवान श्रीराम का मिलाप हुआ।

भरत के लाख प्रयास करने के बाद भी भगवान श्रीराम अपने पिता के दिए गए वचनों पर अडिग रहे। अन्त में भरत भगवान श्रीराम की

खड़ाऊ लेकर अयोध्या पहुँच गए और उनके खड़ाऊं को राज सिंहासन पर असीन करके स्वयं नंदिग्राम में रहकर राजकाज करने लगे।

उधर जी राम पंचवटी की ओर प्रस्थान कर गए तथा सूर्पनखा की नाक काट कर खर और दूषण का वध कर दिया। इसके बाद रावण ने माता सीता का

हरण किया राम और लक्ष्मण माता सीता की खोज में वन - वन भटकते रहे और किष्कीन्धा पहुँचे जहाँ पर उनकी रामभक्त हनुमान से भेंट हुई और महाराजा सुग्रीव से मित्रता।

भगवान श्रीराम ने बाली का वध किया और बाली के वध के पश्चात वानर सेना ने माता सीता की खोज आरंभ कर दी। हनुमान जी लंका पहुँचे

तथा माता सीता को श्रीराम का सन्देश दिया, तथा लंका दहन कर माता सीता की खबर भगवान श्रीराम तक पहुंचाई।

भगवान श्रीराम महाराजा सुग्रीव की सेना की सहायता से लंका पर चढ़ाई करने के लिए चल दिए। लंका पहुंचने के लिए उन्होंने समुद्र पर पत्थरों का सेतु बांधा

और लंका पहुँच गए। जहाँ पर भयंकर युद्ध हुआ, लंकापति रावण के सभी योद्धा तथा महावीर पुत्रों का वध लक्मण अंगद, हनुमान, सुग्रीव, नल, नील तथा वानर सेना ने कर दिया।

भगवान श्रीराम ने कुंभकरण का वध किया तथा लक्मण ने इंद्रजीत मेघनाथ का वध किया। इंद्रजीत वध के बाद रावण पश्चताप की अग्नि में जलने लगा और युद्ध भूमि पर आकार बानर सेना का संहार करने लगा।

रावण और भगवान श्रीराम का युद्ध कई दिनों चला और अन्त में विभीषण की सहायता से रावण का भी वध हो गया। इस प्रकार से भगवान श्री राम ने

माता सीता को पुनः प्राप्त किया तथा समस्त लोकों को रावण तथा आदताई राक्षसों के भय से मुक्त किया। 

इस लेख में आपने भगवान विष्णु के सातवे अवतार (God vishnu ka Saatvan Avtar) श्रीराम अवतार की कथा पड़ी। आशा करता हुँ आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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