कविवर बिहारी का साहित्यिक परिचय Bihari Lal ka Sahityik Parichay

कविवर बिहारी का साहित्यिक परिचय Bihari Lal ka Sahityik Parichay 

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है, आज के हमारे इस लेख कविवर बिहारी लाल के साहित्यिक जीवन परिचय (Kavivar bihari lal ka sahityik jivan parichay) में

दोस्तों इस लेख के माध्यम से आप हिंदी साहित्य के एक महान कवि बिहारीलाल का जीवन परिचय के साथ ही उनकी प्रमुख रचनाएँ, भाव पक्ष,

कला पक्ष तथा अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में जान पाएंगे। तो आइए दोस्तों करते हैं, आजका यह लेख शुरू कविवर बिहारीलाल का साहित्यिक जीवन परिचय:-

रामधारी सिंह दिनकर

कविवर बिहारी का साहित्यिक परिचय


कविवर बिहारीलाल का जीवन परिचय Bihari Lal ka Jivan Parichay 

बिहारीलाल रीतिकाल के एक सम्मानित कवि हैं, जिन्होंने काव्य में श्रृंगार रस का अद्वितीय वर्णन किया है। ऐसे श्रृंगार रस के प्रेमी रीतिकाल के महान कवि बिहारी लाल का जन्म 1595 ईस्वी में गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था।

उनके पिताजी का नाम केशव राय था, जो उन्हें ओरछा लेकर आ गए थे. इसलिए बिहारी लाल का बचपन बुंदेलखंड में ही बीता तथा उनका विवाह मथुरा में हुआ तो वे अपने ससुराल में ही आकर बस गए।

बिहारीलाल के गुरु का नाम बाबा नरहरिदास था। बाबा नरहरिदास ने ही बिहारी लाल का परिचय मुगल सम्राट जहांगीर से करवाया था। बिहारीलाल कुछ समय के लिए जयपुर में भी रहे थे।

उस समय जयपुर के प्रोढ़ महाराजा जयसिंह ने एक अल्प वयस्का से विवाह किया था वह अपनी नवविवाहिता के प्रेम जाल में रूप सौन्दर्य में

इस प्रकार फस गए कि उन्हें अपने राजकाज का भी ध्यान नहीं रहा। ऐसी स्थिति में कवि बिहारी ने ही अपने दोहे उन तक पहुँचाए जिनमें प्रमुख दोहा था

नहीं पराग नहीं मधुर मधु नहिं विकास इहि काल
अली कली ही सौँ बिंध्ययो आगे कौन हवाल

इस दोहे का प्रभाव राजा जयसिंह पर पड़ा और उन्होंने फिर से राजकाज में ध्यान देना शुरू कर दिया। तथा बिहारीलाल को भी दरबार में सम्मान पूर्वक स्थान दिया गया। उनके दरबार में रहते हुए

बिहारी लाल ने लगभग सात सौ तरह 713 दोहों की रचना की जिन्हे बिहारी सप्तशती के नाम से जाना जाता है। बिहारीलाल को प्रत्येक दोहा रचित करने पर एक स्वर्ण मुद्रा दी जाती थी।

ऐसे महान कवि बिहारी लाल का निधन 1663 में हो गया। कविवर बिहारी के आश्रयदाता के रूप में महाराज जयसिंह को और शाहजहाँ को जाना जाता है। 

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बिहारी लाल की साहित्य सेवा Bihari Lal ki Sahitya Seva 

रीतिकाल की धारा रीतिसिद्ध के प्रसिद्ध कवि बिहारी लाल ने एक ही रचना रची है। जिसे बिहारी सप्तसती कहा जाता है, यह ब्रज भाषा में रचित है

तथा उसमें 713 दोहे है। इस रचना के द्वारा उन्होंने हिंदी साहित्य में चार चांद लगा दिए तथा हिंदी साहित्य की शोभा बढ़ा दी। हिंदी में समास पद्धति की शक्ति का परिचय सबसे पहले बिहारी लाल ने ही दिया था।

शृंगार रस के ग्रंथों से बिहारी सतसई सर्वोत्कृष्ट रचना मानी जाती है। श्रृंगार एकता के अतिरिक्त इसमें भक्ति और नीति दोनों का भी अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

बिहारी लाल की प्रसिद्ध रचनाएँ Bihari Lal ki prasiddh rachnaen 

बिहारी लाल ने अपने जीवन काल में राजा जयसिंह के दरबार में रहते हुए 713 दोहों की रचना की है। इन सभी रचनाओं को बिहारी सतसई के नाम से जाना जाता है। बिहारी सतसई ग्रंथ बिहारी लाल की एकमात्र कृति है।

बिहारीलाल का भाव पक्ष Bihari Lal ka bhav paksh 

बिहारीलाल ने जितने भी दोहे लिखे हैं उनमें से अधिकतर दोहे श्रृंगार रस से युक्त हैं। उन्होंने अपने दोहों में सयोग श्रृंगार और वियोग श्रृंगार दोनों को ही स्थान दिया है।

कविवर बिहारी की नायिका का मुख पूर्ण चंद के समान प्रकाशित है और उसके प्रकाश के कारण उसके घर के आस-पास पूर्णिमा ही रहती है। उदाहरण के द्वारा ऐसे समझते हैं:-

पत्रा ही तिथि पाईऐ वा घर के चहूँ पास
नित प्रति पूंन्यो रहत आनन ओप उजास।।

बिहारी लाल के हृदय में भक्ति भावना कूट-कूट कर भरी है। वे प्रभु की भक्ति के रंग में रंग गए थे और प्रभु के चरणों में ही लीन रहने लगे थे। उन्होंने अपने दोहों में शांत रस का प्रयोग किया।

उन्होंने सगुण ब्रह्म कृष्ण की उपासना की है। बिहारी लाल ने अधिकतर दोहे नीति दोहे और उपदेश के लिए लिखे हैं, जबकि उनके दोहों में प्रकृति चित्रण प्रकृति का आलंबन मनोहारी रूप में प्रदर्शित होता है। 

बिहारीलाल का कला पक्ष Bihari Lal ka kala paksh 

बिहारीलाल भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे। इसलिए उनकी भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा मानी जाती है। उनके काव्य में कहीं-कहीं बुंदेलखंडी शब्दों का प्रयोग ही देखने को मिलता है।

इसके साथ ही उन्होंने अरबी फारसी आदि भाषा के शब्दों का मिलाजुला प्रयोग अपनी भाषा में किया है। बिहारी की भाषा में समास का भी प्रयोग हुआ है,

इसलिए उनकी भाषा सामासिक भाषा है। बिहारी लाल ने अपने काव्य को विभिन्न अलंकारों का प्रयोग करके अलंकृत किया है। उन्होंने रूपक, उपमा, अन्योक्ति, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ती आदि अलंकारों का प्रयोग स्वभाविक रूप से किया है।

दोहा छंद को उन्होंने काव्य में प्रमुख स्थान दिया है। बिहारीलाल ने दो पंक्ति के दोहे रचित किए तथा इनके द्वारा ही गागर में सागर भरने का प्रयास किया है।

बिहारीलाल का साहित्य में स्थान Bihari Lal ka Sahitya Mein sthan 

बिहारी की काव्य प्रतिभा बहुमुखी थी। नख शिख वर्णन नायिका के भेद, प्रकृति चित्रण, रस, अलंकार सभी बिहारी के काव्य में उत्कृष्ट हैं।

उनकी रचना में कवित्त शक्ति तीनों का जैसा सुंदर मिश्रण देखना बहुत ही दुर्लभ हो जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कविवर बिहारी के विषय में कहा है,

जिस कवि में कल्पना की समाहार शक्ति के साथ भाषा की समझ शक्ति जितनी ही अधिक होगी उतनी ही उसकी मुक्तक रचना सफल होगी और यह क्षमता बिहारी में पूर्ण रूप से विद्यमान थी। 

दोस्तों आपने इस लेख में बिहारी लाल का साहित्यिक परिचय (Kavivar bihari lal ka sahityik jivan parichay) बिहारीलाल का जीवन परिचय बिहारी लाल की रचनाएँ, कविताएँ आदि के बारे में पढ़ा। आशा करता हूँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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