मीराबाई का साहित्यिक जीवन परिचय Mirabai ka sahityik Jivan Parichay 

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है, आज के हमारे इस लेख मीराबाई का जीवन परिचय में। दोस्तों इस लेख में आप भक्त कवि मीराबाई का जीवन परिचय पड़ेंगे।

इसके साथ ही आप मीराबाई कौन थी? मीराबाई की साहित्यिक रचनाएँ मीराबाई का भाव पक्ष कला पक्ष के साथ अन्य महत्वपूर्ण

तथ्यों के बारे में भी जान पाएंगे।तो आइए दोस्तों करते हैं, आज का यह लेख शुरू मीराबाई का जीवन परिचय:-

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मीराबाई का साहित्यिक जीवन परिचय


मीराबाई का जीवन परिचय Mirabai ka Jivan Parichay 

जब बात हिंदी साहित्य की हो रही हो तो उसमें मीराबाई का नाम अवश्य लिया जाता है। मीराबाई ने हिंदी साहित्य को भक्तिपरक रचनाएँ प्रदान की हैं।

ऐसी भक्तवत्सल रचनाएँ लिखने वाली मीराबाई का जन्म राजस्थान में जोधपुर के मेड़ता के निकट चौकड़ी ग्राम में सन 1503 में हुआ था। उनके पिता का नाम राठौर रतन सिंह था।

जब मीराबाई बचपन अवस्था में थी तब उनकी माँ का निधन हो गया तथा उनके पिताजी भी अपने कार्य के कारण हमेशा घर से दूर रहा करते थे।

इसलिए उनका पालन पोषण मुख्य रूप से उनके पितामह राव दूदा जी के संरक्षण में हुआ था। राव दूदा जी भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त थे और भगवान श्री कृष्ण की भक्ति करते रहते थे,

जिसका प्रभाव मीरा पर भी पड़ा और वह भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के रंग में रंग गई। मीराबाई का विवाह उदयपुर के महाराज भोजराज के साथ किया गया था। जो महाराणा सांगा के पुत्र थे।

किंतु कुछ वर्ष के बाद महाराज भोजराज का स्वर्गवास हो गया तथा मीराबाई पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अपने पति की मृत्यु के कारण वे जीवन से वैराग्य की ओर जाने लगी और साधु संतों की संगति में रहकर भजन कीर्तन करने लगी।

किन्तु राणा परिवार अपनी बहू को साधु संतों की संगति में देखकर चिंतित होने लगा और मीराबाई से रुष्ट हो गया। उस समय चित्तौड़ के तत्कालीन राणा ने उन्हें विभिन्न प्रकार की यातनाएँ दी

तथा उन्हें सही राह पर लाने का प्रयास किया एक बार तो मीरा को विश भी दिया गया किंतु इसका भी मीरा पर किसी भी प्रकार का असर नहीं पड़ा।

अंत में मीराबाई भगवान कृष्ण की भूमि मथुरा वृंदावन चली गई और उन्होंने अपना जीवन भक्ति में बिताया। मीरा की भक्ति भावना इतनी प्रबल और अडिग थी

की वे प्रभु प्रेम में दीवानी हो गई और संसार से विरक्त होकर भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन रहने लगी। मीराबाई अपने अंतिम दिनों में द्वारका चली गई वहीं पर 1546 में उनका स्वर्गवास हो गया। 

मीराबाई की साहित्य सेवा Mirabai ki Sahitya Seva 

मीराबाई ने जो भी रचनाएँ हिंदी साहित्य को प्रदान की हैं उनमें उनके हृदय की ममस्पर्शी वेदना तथा भक्ति भावना साक्षात दिखाई देती है।

मीराबाई ने सीधे सरल भाव से अपने हृदय के भावों को कविता के रूप में व्यक्त करने की कोशिश की है। इसलिए उनका साहित्य

भक्ति के आवरण में बड़ी ही पवित्रता और संगीत के माधुर्य में धड़कता दिखता है। मन की शांति के लिए उन्होंने भक्ति मार्ग को चुना और विभिन्न भक्ति परक रचनाएँ हिंदी साहित्य को प्रदान की। 

मीराबाई की रचनाएँ Mirabai ki Rachnaen 

मीराबाई ने विभिन्न प्रकार की रचनाएँ रचित की हैं। जिनमें से प्रमुख रूप से नरसी जी का मायरा, गीत गोविंद की टीका, राग गोविंद,

राग सोरठ के पद,मीराबाई का मलार, गरबा गीत, राग बिहाग और फुटकर पद आदि हैं। मीराबाई भौतिक जीवन से पूरी तरह से निराश हो तो गई थी

इसलिए उन्होंने अपने पूरे मन को भगवान श्री कृष्ण के भक्ति पर केंद्रित किया उनकी सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।।

मीराबाई का भाव पक्ष Mirabai ka bhav Paksh 

मीराबाई ने हिंदी साहित्य को जितनी भी रचनाएँ प्रदान की हैं, उनकी उन सभी रचनाओं में उनके हृदय की ममस्पर्शी वेदना, प्रेम की ऑकुलता के साथ ही भक्ति भावना साक्षात नजर आती है।

उन्होंने अपने मन की अनुभूति को सीधे सरल वाक्यों में अपने पदों में और रचनाओं में प्रस्तुत किया है। मीरा के पदों और रचनाओं के गायन से यह ज्ञात हो जाता है,

कि मीरा की भक्ति भावना अत्यंत हृदय की गहराइयों से संबंधित है। उन्होंने मुक्त भाव से सभी भक्ति संप्रदाय के प्रभाव ग्रहण किए हैं। मीराबाई का भाव पक्ष साहित्य की दृष्टि से अत्यंत मार्मिक पक्ष माना जाता है।

मीराबाई के आराध्य भगवान श्रीकृष्ण हैं, किंतु उनके कई पदों में राष्ट्रवाद भी दिखाई देता है। जिसे बाद में प्रिय के प्रति उत्सुकता मिलन और प्रयोग का सजीवता सा चित्र नजर आता है।

मीराबाई का कला पक्ष Mirabai ka Kala Paksh 

मीराबाई हिंदी साहित्य की एक महान कवयित्री हैं, जिन्हें भक्त कवयित्री के नाम से जाना जाता है। उनकी मुख्य रूप से भाषा राजस्थानी और ब्रज भाषा है, किंतु पदों की रचना उन्होंने केवल ब्रजभाषा में ही की है।

उनके कुछ पदों में भोजपुरी की भी कभी-कभी झलक दिखाई देती है। मीरा ने विभिन्न साधु-संतो संगति की है, इस कारण उनकी भाषा साहित्यिक भाषा ना होकर जन भाषा हो गई है।

मीरा ने मुक्तक शैली का अधिक प्रयोग किया है, उनके पदों में अधिकतर गेयता देखने को मिलती है। भाव संप्रेषण मीरा की गीति शैली की प्रमुख प्रधानता रही है।मीराबाई ने अपनी रचनाओं में अधिकतर

उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास जैसे अलंकारों का प्रयोग किया है। इस कारण उनकी भाषा में अलंकार सौंदर्य साफ-साफ नजर आता है।

मीराबाई का साहित्य में स्थान Mirabai ka Sahitya Mein sthan 

मीराबाई एक भक्त कवि हैं, जो सांसारिक जीवन से पूरी तरह से विरक्त हो चुकी थी और उन्होंने अपनी संपूर्ण शक्ति भगवान श्री कृष्ण की भक्ति पर ही टिका दी।

अपने हृदय की व्यथा को बड़े मार्मिक ढंग से अपने पदों में प्रस्तुत किया है। भक्ति काल के स्वर युग में मीरा के भक्ति भाव से संपन्न पद आज भी अलग ही जगमगाते हुए दिखाई देते हैं।

दोस्तों आपने इस लेख में मीराबाई का साहित्यिक जीवन परिचय पड़ा आशा करता हूँ, आपका यह लेख अच्छा लगा होगा।

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