राजा सगर की कहानी Raja Sagar ki Kahani

राजा सगर की कहानी

राजा सगर की कहानी Raja Sagar ki Kahani 

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है आज के हमारे इस लेख राजा सगर की कहानी (Raja Sagar ki Kahani) में दोस्तों इस लेख के माध्यम से आज आप इक्ष्वाकु वंश के प्रसिद्ध

और पराक्रमी राजा सगर के बारे में जानेंगे, कि राजा सागर कौन थे? राजा सगर के पिता कौन थे? राजा सगर की पत्नी का क्या नाम था? तो दोस्तों आइए बढ़ते हैं आज के इस लेख राजा सगर की कहानी:-

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राजा सगर कौन थे Who was king Sagar 

राजा सगर इक्ष्वाकु वंश के महान प्रतापी और प्रजावत्सल राजा थे। उनके राज्य में प्रजा चहूँ और से सुखी थी, किन्तु उन्हें अक्सर अपने पुत्रों की चिंता सताया करती थी।

कियोकि उनके साठ हजार एक पुत्र थे, जो दुराचारी और क्रूर प्रवृति के थे तथा हमेशा ही लोगों, ऋषि मुनियों को सताया करते थे। 

राजा सगर के पिता कौन थे Who was father of King Sagar 

राजा सगर के पिता का नाम असित था, जो इक्ष्वाकु वंश के कुलदीपक तथा अयोध्या के महाराज थे। उनके राज्य में चारों तरफ प्रसन्नता, संपन्नता और खुशहाली थी।

वे अपनी प्रजा को अपने पुत्रों की भांति प्रेम करते और हमेशा उनकी रक्षा और उनकी संपन्नता का ख्याल रखते थे। उनके शासनकाल में कोई भी प्राणी दुखी नहीं था।

किंतु एक बार महाराज असित को पराजित करने के लिए कई राजाओं के संघ ने उन पर आक्रमण कर दिया। महाराज असित ने बड़े पराक्रम के साथ युद्ध किया,

किंतु उनकी सेना राजाओं के संघों की सेना के सामने ना टिक सकी और राजा को अपनी दोनो पत्नियों के साथ हिमालय की गुफाओं में शरण लेनी पड़ी।

महाराज असित की दोनों पत्नियाँ उस समय गर्भवती थी, किंतु कुछ समय के पश्चात महाराज ने वहीं पर प्राण त्याग दिए तथा महाराज असित की एक पत्नी ने महाराज असित की दूसरी पत्नी

कालिंदी को विष दे दिया। महारानी कालिंदी अपनी संतान की रक्षा के लिए महर्षि च्यवन के पास गई तब महर्षि च्यवन ने कालिंदी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि, तुम्हारा पुत्र विष के साथ जन्म लेगा और उसका नाम सगर होगा। 

राजा सगर की पत्नी का नाम Raja Sagar ki Patni ka Naam 

वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा सगर का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। राजा सगर अयोध्या के राजा थे, जिनकी दो पत्नियाँ थी एक का नाम था केशिनी और दूसरी का नाम था सुमति

राजा सगर की दोनों महारानियाँ रूपी यौवन में एक से बढ़कर एक सुंदर थी, और अपने रूप यौवन पर अभिमान करती थी, संभवतः इसी कारण उन्हें कई वर्षों के पश्चात भी संतान की प्राप्ति नहीं हुई।

अतः संतान की प्राप्ति के उद्देश्य से राजा सगर अपनी दोनों पत्नियों के साथ हिमालय पर्वत की गुफाओं में तपस्या करने के लिए चले गए

जहाँ पर भगवान भृगु ऋषि जी के आशीर्वाद फलस्वरूप महारानी केशिनी के गर्भ से असमंजस और सुमति के गर्भ से एक गर्भपिंड ने जन्म लिया जो फटकर 60 हजार पुत्रों में विभाजित हो गया।

राजा सगर की कथा Story of King Sagar 

राजा सगर के साठ हजार 1 पुत्र थे, जिनमें से साठ हजार पुत्र महारानी सुमति के गर्भ से उत्पन्न हुए थे, वहीं एक पुत्र महारानी केशिनी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था।

महाराज सगर के सभी पुत्र बहुत ही क्रूर प्रवृत्ति के थे, जो लोगों को परेशान करते ऋषि-मुनियों को सताते और आसमान में विचरण करने वाले पक्षियों को मार डालते थे। राजा सगर अपने पुत्रों के इन कृत्यो के कारण हमेशा ही परेशान रहा करते थे।

राजा सगर का पुत्र असमंजस जो केशिनी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था बड़ा ही क्रूर प्रवृत्ति का था, जो छोटे-छोटे बच्चों को मार दिया करता था और नगर की जनता को सताया करता था।

एक दिन क्रोध के वशीभूत होकर राजा सगर ने असमंजस को अपने राज्य से निकाल दिया और असमंजस वन में जाकर तपस्या करने लगा उसने उसी दिन से सन्यास ग्रहण कर लिया।

राजा सागर को अपने राज्य की चिंता सताने लगी थी, कि उसके पश्चात राज्य का उत्तराधिकारी कौन बनेगा, क्योंकि उसके साठ हजार पुत्र भी क्रूर प्रवृत्ति के थे। तभी देवर्षि नारद महाराज सगर के पास गए और उन्होंने कहा महाराज सगर आपके साठ हजार पुत्र हैं,

आप पृथ्वी के एक शक्तिशाली राजा है। आपको एक अश्वमेघ यज्ञ करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप आपकी कीर्ति चारों दिशाओं में फैल जाएगी और आपके पुत्रों को सद्बुद्धि भी प्राप्त होगी,

किंतु जब असमंजस को इस बात का पता चला, कि महाराज सगर अश्वमेध यज्ञ करने वाले हैं, तो असमंजस महाराज सागर के पास पहुंचा और महाराज सगर से हाथ जोड़कर निवेदन करने लगा,

कि वह यज्ञ ना करें, किंतु महाराज सगर ने असमंजस की एक ना मानी और अश्वमेध यज्ञ प्रारंभ कर दिया। अश्वमेध के उपरांत यज्ञ का अश्व छोड़ा गया, जिसकी रक्षा करने का दायित्व साठ हजार पुत्रों को मिला।

चारों दिशाओं में अश्वमेघ का घोड़ा दौड़ा और राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने विभिन्न देशों के राजाओं से युद्ध किया, जिसमें कई देश के राजा मारे गए कई देश के राजाओं को बंदी बना लिया गया।

राजा सगर के पुत्रों ने विभिन्न देशों में प्रजा को प्रताड़ित किया। यह सब देखकर सभी देवता डर गए और स्वयं इंद्र को भी यह डर सताने लगा अगर राजा सगर का अश्वमेध यज्ञ पूर्ण होता है,

तो वह है स्वर्ग पर चढ़ाई करके स्वर्ग को छीन लेंगे। तब देवराज इंद्र ने देवर्षि नारद के सुझाव के अनुसार यज्ञ का घोड़ा कपिल मुनि के आश्रम में ले जाकर बांध दिया। जब राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को ज्ञात हुआ कि घोड़ा कहीं चला गया है,

तो उन्होंने घोड़ा को सर्वत्र ढूंढने का प्रयास किया और घोड़े को ढूंढते ढूंढते वे कपिल मुनि के आश्रम में जा पहुँचे जहाँ पर घोड़ा एक रस्सी से बना हुआ था और कपिल मुनि अपने ध्यान में व्यस्त थे।

राजा सगर के पुत्र कपिल मुनि के आश्रम में घोड़े को देखकर यह समझ बैठे की घोड़े को कपिल मुनि ने ही चुराया है और कपिल मुनि के बारे में भला बुरा कहने लगे। अचानक कपिल मुनि की आंखें खुल गई

उनसे उनका अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ तभी उन्होंने उसी क्षण राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को जलाकर भस्म कर दिया। इधर राजा सगर को अपने पुत्रों की चिंता सताने लगी

राजा सगर ने अपने पुत्रों को और अश्वमेध यज्ञ के घोड़ा को खोजने के लिए सैनिकों को चारों दिशाओं में भेजा, किंतु सैनिकों को कहीं भी घोड़ा और राजा सगर के पुत्रों का पता नहीं चला।

अंततः राजा सगर अपने पुत्र असमंजस के पास गए और अश्वमेध यज्ञ करवाने के निर्णय पर पछताने लगे। तब असमंजस ने कहा हे! पिताश्री अभी आपका एक पुत्र असमंजस जीवित है,

में अपने भाइयों को खोजने के लिए  अवश्य जाऊंगा और अश्वमेध यज्ञ भी पूरा अवश्य ही होगा। असमंजस अपने साठ हजार भाइयों को खोजते-खोजते कपिल मुनि के आश्रम में जा पहुँचे वहाँ पर साठ हजार मृतकों की राख/भस्म दिखाई दी।

उनकी राख/भस्म को देखते ही असमंजस समझ गए यह उनके भाइयों की ही है और कपिल मुनि ने उन्हें जला दिया है। असमंजस कपिल मुनि के आश्रम में प्रवेश हुए और कपिल मुनि को प्रणाम करने लगे।

तब कपिल मुनि ने असमंजस का परिचय जानना चाहा और असमंजस ने कहा में अयोध्या नरेश राजा सगर का पुत्र असमंजस हूँ और यह साठ हजार राख/भस्म के ढेर राजा सगर के पुत्र और मेरे भाई है।

में अपने भाइयों की ओर से आपसे माफी मांगता हूँ। असमंजस के विनम्र स्वभाव से कपिल मुनि प्रसन्न हो गए और उन्होंने महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों के तरने का असमंजस को रास्ता बताया,

कि जब तुम्हारे वंश में राजा भागीरथ जन्म लेंगे तब उनकी तप के प्रभाव से वे गंगा जी को धरती पर लाएंगे और माँ गंगा के तर्पण से ही

आपके भाइयों को मुक्ति मिल जाएगी। कपिल मुनि ने कहा हे! पुत्र असमंजस तुम यह यज्ञ का घोड़ा ले जाइए और अपना अश्वमेघ यज्ञ को पूर्ण कीजिए।

यह सब विधि के विधान के अनुसार ही हो रहा है, आप शोक मत कीजिए। असमंजस कपिल मुनि को प्रणाम करके अयोध्या लौट आए और अपने साठ हजार भाइयों की मृत्यु की समाचार राजा सगर को दिया।

राजा सगर को अपने साठ हजार पुत्रों की मृत्यु का बड़ा ही आघात पहुंचा और उन्होंने अपना अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण करके असमंजस के पुत्र अंशुमान को अयोध्या का राजा बना दिया। 

दोस्तों आपने इस लेख में राजा सगर की कहानी (Raja Sagar ki Kahani) पढ़ी। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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