पंचायती राज व्यवस्था पर निबंध Essay on Panchayati Raj System

पंचायती राज व्यवस्था पर निबंध Essay on Panchayati Raj System

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख पंचायती राज व्यवस्था पर निबंध (Essay on Panchayati Raj System) में।

दोस्तों इस लेख के द्वारा आप पंचायती राज व्यवस्था से सम्बंधित सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को जान पायेंगे। यह पंचायती राज व्यवस्था पर निबंध कक्षा 5 से

कक्षा 12 वीं तथा उच्च कक्षाओं के छात्रों के लिए बहुत उपयोगी होगा। यहाँ से आप पंचायती राज व्यवस्था पर निबंध लिखने का आईडिया भी ले सकते है:-

संविधान दिवस पर निबंध

पंचायती राज व्यवस्था पर निबंध

पंचायती राज क्या है What is Panchayati Raj

पंचायती राज व्यवस्था पर निबंध:- भारत एक ऐसा देश है, जहाँ पर लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था (Democratic System) है अर्थात यहाँ पर जनता का जनता के लिए जनता द्वारा शासन होता है और इस लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत पंचायती राज व्यवस्था वह एक माध्यम होती है,

जो शासन को जनता के दरवाजे तक खींच कर लाती है इसलिए ही यह लोकतंत्र को सबसे सशक्त बनाने के लिए अस्तित्व में लाई गई थी। पंचायती राजव्यवस्था एक ऐसी शासन व्यवस्था है,

जिसमें स्थानीय लोगों की समस्या स्थानीय शासन के द्वारा सुनी जाती है, क्योंकि वे अपनी स्थानीय समस्याओं का स्थानीय पद्धति से समाधान प्राप्त कर पाते है।

अर्थात साधारण शब्दों में कहा जा सकता है, कि पंचायती राज व्यवस्था एक ऐसी राज व्यवस्था है, जो ग्रामीण स्तर पर ग्रामीण लोगों के सर्वागीण विकास के के लिए चलाई गई शासन की एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है।

पंचायती राज व्यवस्था का इतिहास History of Panchayati Raj System 

भारत देश को आजादी प्राप्त होने के बाद भारत के ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति बहुत ही बेकार थी, इसीलिए गरीबों और ग्रामीण विकास के लिए महात्मा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर 2 अक्टूबर 1952 को

भारतीय शासन के द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम (Samudayik Development Programm) प्रारंभ कर दिया गया, जिसका प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण विकास करना था।

इसके बाद 2 अक्टूबर 1952 को ही राष्ट्रीय विस्तार सेवा का शुभारंभ भी हुआ। कुछ पश्चात गांवों में रह रहे ग्रामीण लोगों की समस्याओं के बारे में जानकारी और उन समस्याओं का अध्ययन

करने के लिए 1957 में स्वर्गीय बलवंत राय मेहता समिति (Balwant Rai Mehta Committee) का गठन किया गया और 24 नवंबर 1957 को इस समिति ने अपना एक रिपोर्ट केंद्र शासन को सौप दी,

जिसमें ग्रामीण लोगों की समस्याओ को सुलझाने और ग्रामीण लोगों का विकास करने की व्यवस्था के अंतर्गत ग्राम स्तर, ब्लॉक स्तर और जिला स्तर पर त्रिस्तरीय व्यवस्था की स्थापना करने की सिफारिश की गई

और भारत सरकार द्वारा समिति की सिफारिश को स्वीकृति प्रदान भी की गई और उसका नाम पंचायती राज संस्था (Panchayati Raj Institution) रखा गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पंचायती राज की

स्थापना भारत में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण (Democratic decentralization) की अवधारणा को साकार करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम मानी जाती है।

राजस्थान को भरत का प्रथम राज्य होने का गौरव भी इसी के द्वारा ही प्रदान हुआ क्योंकि राजस्थान में ही पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना सबसे पहले की गई।

2 सितंबर 1959 को राजस्थान के विधान मंडल ने सर्वप्रथम पंचायत समिति जिला परिषद अधिनियम 1959 पारित किया। महात्मा गांधी के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर 2 अक्टूबर 1959 को

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय पंडित लाल जवाहरलाल नेहरू के द्वारा पंचायती राज का उद्घाटन राजस्थान के नागौर जिले में कर दिया गया और तबसे पंचायती राज व्यवस्था सभी राज्यों में चल रही है।

कहीं-कहीं पर यह एक स्तरीय कहीं-कहीं पर दो स्तरीय तो कहीं पर त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली देखने को मिलती है। वर्ष 1993 में 73 और 74 वे संविधान संशोधन के तहत पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा भी प्राप्त हो गया।

त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की संरचना Structure of the Three Tier Panchayati Raj System

ग्राम पंचायत Gram Panchayat 

त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की सबसे पहली इकाई ग्राम पंचायत होती है, जिसका चुनाव ग्राम सभा के द्वारा किया जाता है। ग्राम पंचायत विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका की तरह भी कार्य करती है।

ग्राम पंचायत का गठन कई वार्डों को मिलाकर किया जाता है।एक वार्ड में कम से कम 500 की आवादी ही होती है। प्रत्येक वार्ड से एक ग्राम पंचायत सदस्य तथा एक ग्राम पंचायत में एक सरपंच और उपसरपंच होते हैं।

पंचायत समिति या क्षेत्र पंचायत Panchayat Samiti 

त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का यह मध्यवर्ती स्तर होता है। प्रत्येक राज्यों में इसे अलग - अलग नामों से जाना जाता है। सरकार जिलों को विकास की दृष्टि से कई  खंडो में बाँटती है,

जिसे विकास खंड या ब्लॉक खंड कहते है और इसी ब्लॉक के स्तर पर पंचायत समिति का गठन होता है। लगभग 5000 की आबादी पर एक समिति का गठन किया जाता है, जिसके सभी ऑफिशियल कार्य बीडीओ (BDO) ब्लॉक डेवलपमेंट अधिकारी के द्वारा होता है।

जिला परिषद Jila Parishad 

जिला परिषद त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की तीसरी तथा सबसे प्रमुख संस्था होती है, जिसका गठन 50000 की आबादी पर किया जाता है।

प्रत्येक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र से जिला परिषद सदस्य पद पर एक-एक प्रतिनिधि निर्वाचित होता है जो सभी अपने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं, जो 5 वर्षों तक के लिए चुने जाते हैं।

जिला अध्यक्ष पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत आने वाली योजनाओं के क्रियान्वयन के साथ ही उन सभी योजनाओं पर निगरानी करने का कार्य करता है। 

पंचायती राज व्यवस्था की चुनौतियाँ Challenges of Panchayati Raj System

पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा तो प्राप्त हो गया, किंतु पंचायती राज व्यवस्था के लिए कई प्रकार की चुनौतियां सामने आ गई जो निम्न प्रकार से हैं:-

  1. योग्य प्रशासकों और विशेषज्ञों की कमी:- यह बात सही है, कि योग्य प्रशासकों और विशेषज्ञों के अभाव में किसी भी प्रकार का नियोजन किसी भी प्रकार का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता है, अगर योग्य विशेषज्ञ प्रशासक मिल भी जाते हैं,तो उन्हें ठीक प्रकार से पंचायती राज व्यवस्था में स्थान भी नहीं मिल पाता है, जिसकारण से वे निराश हो जाते हैं और हताश हो जाते हैं, तथा उनका मनोबल भी निरंतर गिरता जाता है और वह अपना कार्य छोड़कर अन्य जगह कार्य करना प्रारंभ कर देते हैं। यदि कोई प्रशासक ठीक प्रकार से ईमानदारी और लगन से काम भी करता है, तो उसके कार्य में दखलअंदाजी की जाती है। राजनीतिक और हाईकमान के दबाव में आकर वह अपने कार्य रोक देता है, जिससे पंचायती राज व्यवस्था में योग्य प्रशासकों और विशेषज्ञों की लगातार कमी होती जा रही है।
  2. विश्वसनीय तथ्यों की कमी :- जब तक ठीक प्रकार से तथ्य या फिर कोई योजना का प्रारूप प्राप्त नहीं हो जाता है, तब तक किसी भी प्रकार की विकास की कल्पना नहीं होती है, किंतु कभी-कभी आंकड़े तो सभी विषयों में पूर्णता मिल जाते हैं, किंतु वे विश्वसनीय है या नहीं इस पर संशय बना रहता है, जैसे कि विधवा पेंशन योजना  ग्रामीण आवास योजना, जब तक प्रशासन को सही तथ्य विश्वसनीयता नहीं मिल जाता तब तक ग्रामीण विकास के विकासात्मक कार्यों की योजना बनाना और उनके क्रियान्वयन के लिए वास्तविक परिणामों की कल्पना करना व्यर्थ होता है।
  3. अधिकारियों के बीच मतभेद :- जहाँ नीति निर्माण होता है तथा समन्वय किया जाता है, वह जिले के विकास कार्यक्रम में ब्रेक का कार्य करने लगता है, जिससे विकास का कार्य रुक जाता है। विकास की योजनाओं के निर्माण के लिए जो कार्य और क्रियान्वयन किया जाना होता है, वह विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है। यह वास्तव में अधिकारियों के बीच मतभेद और खराब संबंधों के कारण ही होता है। विभागीय अधिकारियों में तनाव, मनमुटाव, ईर्ष्या की भावना का विकास हो जाना जिससे आपसी सहयोग और समन्वय का अभाव दिन पर दिन उन्हें बडाता जा रहा है।
  4. जनसहयोग का आभाव:- पंचायती राज व्यवस्था में ऐसी कई योजनाएँ होती हैं, जिनका पूरी तरह सक्रियकरण करने के लिए जन सहयोग की भी जरूरत होती है। चाहे वह ग्राम की योजना हो या फिर जिला परिषद की योजना हो। राज्य और केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित योजना को पंचायती राज व्यवस्था से संबंधित अधिकारियों के माध्यम से पूर्ण तो किया जाता है लेकिन इस योजना के क्रियान्वयन में जन सहयोग का अभाव हो जाता है और योजनाएँ सफल नहीं हो पाती है, अनेक समस्याएँ सामने आ जाती हैं, पंचवर्षीय योजनाएँ, आवास योजनाएँ, जन सहयोग के बिना सफल ही नहीं हो सकती।
  5. तानाशाही का प्रभाव:- पंचायती राज व्यवस्था में तानाशाही का प्रभाव दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है, जिससे कई योजनाएँ पूरी नहीं हो पाती है। विभिन्न योजनाओं की फाइल महीने तक डली रहती है, जिससे आम आदमी को उसका लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है। भवन निर्माण कार्य, रोड निर्माण कार्य के लिए प्रपत्र जिला परिषद महानगर पालिका भेजा जाता है, तो इसमें कई दिन लग जाते हैं, जबकि बार-बार चक्कर लगाने के बाद भी काम नहीं हो पाता है और घूसखोरी, भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ सामने आती हैं।
  6. आर्थिक साधन का अभाव :- त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में चाहे ग्राम पंचायत हो या जिला परिषद हो इनके पास धन और समुचित साधनों की उपलब्धता बहुत ही कम होती है। इन संस्थाओं के स्वतंत्र आर्थिक स्रोत बहुत ही कम दिए गए हैं, अर्थात ना के बराबर ही दिए गए हैं, जिसके कारण इनका अधिकतर कार्य शासकीय अनुदानों के आधार पर ही पूरा हो पाता है।

पंचायती राज व्यवस्था की चुनौतियों का समाधान Solution challenges of Panchayati Raj system

  1. पंचायती राज व्यवस्था को अधिक मजबूत बनाने के लिए सरकार को अपने आला अधिकारियों की तानाशाही पर अंकुश लगाना चाहिए और उनकी गतिविधियों को निरंतर देखते रहना चाहिए।
  2. पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत आने वाले अधिकारियों को आम जनता को योजनाओं के सफल क्रियान्वयन में सहयोग देना चाहिए, ताकि ग्रामीण विकास के लिए प्रशासन को सहयोग मिल सके।
  3. विकासात्मक सभी प्रकार के कार्य करने के लिए प्रशासक को और विशेषज्ञों को स्वतंत्र रूप से अपने अनुभव एवं कार्य कुशलता के आधार पर कार्य करने के अवसर दिए जाने चाहिए।
  4. पंचायती राज व्यवस्था के द्वारा ग्रामीण विकास के लिए जो भी कार्य किए जाते हैं, उसमें ग्रामीण जनता के द्वारा पूरी तरह से सहयोग किया जाना चाहिए।
  5. पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत जो भी योजनाएँ ग्रामीण विकास ग्रामीण लोगों के विकास के लिए आती हैं  वह जल्द से जल्द ग्रामीणों तक पहुंच सके, इसके अलावा रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार को भी कम करने के लिए सरकार को प्रयास करना चाहिए।

पंचायती राज व्यवस्था राजनीतिक जागरूकता के साथ ही साथ आम आदमी के सशक्तिकरण का भी परिचायक होती है, इसीलिए विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्था और सहभागिता मूलक लोकतंत्र पंचायती राज व्यवस्था के दो मुख्य घटक है, इसको सफलता केवल स्थानीय स्तर पर लोगों की सफलता के लिए नहीं बल्कि देश में लोकतंत्र के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक होती है।

दोस्तों आपने यहाँ पर पंचायती राज व्यवस्था पर निबंध (Essay on Panchayat raj system) पढ़ा। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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