भारत में जल संकट पर निबंध Essay on Water Crisis in India

भारत में जल संकट पर निबंध Essay on Water Crisis in India

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है, आज के हमारे इस लेख भारत में जल संकट पर निबंध (Essay on Water Crisis in India) में।

दोस्तों आप इस लेख के माध्यम से वैश्विक जल संकट पर निबंध, भारत में जल संकट पर निबंध पड़ेंगे। दोस्तों यह एक ज्वलंत समस्या है,

जिससे संपूर्ण विश्व जूझ रहा है। दोस्तों यह निबंध कक्षा पांचवी से कक्षा बारहवीं तथा उच्च कक्षा के विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है, यहाँ से आप भारत में जल संकट पर निबंध वैश्विक जल संकट पर निबंध लिखने का आइडिया भी ले सकते हैं:-

जल ही जीवन है पर निबंध

भारत में जल संकट पर निबंध

जल संकट क्या है What is Water Crisis 

जल सभी प्राणियों के लिए जीवन का एक मूलभूत आधार है और जल ही वह एक ऐसा तत्व है, जो पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में उपस्थित है,

किंतु जब विभिन्न कारणों के फलस्वरुप एक निश्चित क्षेत्र के अंदर जल उपयोग की मांग इतनी अधिक हो जाती है, कि जो जल उपलब्धता के साधन है वह जल की माँग की पूर्ति ही नहीं कर पाते हैं,

उस स्थिति को जल संकट कहा जाता है। एक सर्वे के अनुसार पता लगाया गया, कि दुनिया के लगभग 2.8 बिलियन से अधिक लोग साल में कम से कम 1 महीने पीने की पानी की कमी के कारण प्रभावित होते हैं,

जबकि 1.2 बिलियन से अधिक लोगों के पास साल भर तक शुद्ध पीने का पानी प्राप्त नहीं हो पाता है। साधारण शब्दों में कह सकते हैं, कि जल संकट वह एक विपदा होती है, जिसमें एक निश्चित क्षेत्र में जल स्रोतो

और उपलब्ध संसाधनों द्वारा जल की मांग पूरी नहीं हो पाती और उस क्षेत्र के लोग जल की कमी के कारण प्रभावित होते हैं।

भारत में जल संकट पर निबंध

भारत में जल संकट Water Crisis in India 

दुनिया भर के अन्य देशों की तरह भारत भी जल संकट की समस्या से जूझने वाला एक देश है। अगर भारत में जल उपलब्धता और उसके उपयोग के कुछ तथ्यों के आधार पर हम बात करें

तो भारत में सम्पूर्ण विश्व का ताजे जल स्रोत का मात्र 4% हिस्सा ही मौजूद है, जिससे विश्व की जनसंख्या के 18% आबादी से अधिक लोगों को जल उपलब्ध कराया जाता है। केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार

बताया गया कि 2010 में देश में मौजूद कुल ताजे जल स्रोतों में से 78% का उपयोग सिंचाई के लिए किया जा रहा है और यह 2050 तक लगभग 68% के स्तर तक जा सकता है। वर्ष 2010 में घरेलू उपयोग में

इसकी मात्रा 6% थी जो वर्ष 2050 तक बढ़कर 9.5 % तक जा सकती है। इस प्रकार यह साफ हो जाता है, कि भारत में कृषि क्षेत्र जल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता क्षेत्र है। इससे यह भी अनुमान लगाया जाता है,

कि जब तक इस क्षेत्र में जल की आपूर्ति उपयोग के मामले में कुशलता नहीं आएगी तब तक इस मामले में बहुत अधिक सुधार की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।

भारत सरकार अभी तक जल संरक्षण और उसके होने वाले दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई भी गंभीर कदम नहीं उठा रही है और ऐसा भी अनुमान लगाया जा रहा है, कि यदि इस स्थिति में सुधार नहीं किया जाता है,

तो कुछ ही वर्षों में भारत को बड़ी ही गंभीर जल संकट की समस्या का सामना करना पड़ेगा। दक्षिण अफ्रीका के एक शहर में कुछ समय पूर्व ही जल आपात की घोषणा की गई थी।

ऐसी ही स्थिति चेन्नई के संदर्भ में भी देखने को मिल रही थी। उपर्युक्त संदर्भ में भारत के लिए यह मुद्दा जल संरक्षण एक अति महत्वपूर्ण प्रश्न बनकर उभरा है, जिसे समय रहते हल करना आवश्यक है।

वर्तमान में भूमिगत जल के प्रबंधन का कोई भी प्रभावी नियम मौजूद नहीं है, सिंचाई के लिए सस्ती और निशुल्क विद्युत आपूर्ति की नीति में भूजल के उपयोग के संबंध में एक अव्यवस्था को उत्पन्न कर दिया है।

इस नीति के द्वारा एक ओर कृषि को बिजली सब्सिडी देने के कारण भारतीय राजकोष को प्रतिवर्ष ₹70000 करोड़ का घाटा होता है, वहीं दूसरी और भूजल स्तर भी लगातार गिरता जा रहा है।

यह स्थिति 256 जिलों के 1592 प्रखंड भूजल के संकट पूर्ण अथवा अति अवशोषित स्थिति में पहुंच गए हैं। पंजाब जैसे क्षेत्रों में भौम जल स्तर में प्रतिवर्ष 1 मीटर तक की कमी देखने को मिल रही है

और यह प्रक्रिया लगातार लगभग 2 दशकों से जारी है। पंजाब के लगभग 80% प्रखंड भूजल के संकट पूर्व अथवा अति अवशोषित स्थिति में पहुंच चुके हैं। 

भारत में जल संकट के कारण Reasons for water crisis in India

भारत में विभिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं, जिनमें जल की आवश्यकता भी बहुत होती है। धान और गन्ना  ऐसी फसलें होती हैं, जो भारत की कुल सिंचाई जल के लगभग 60% जल का उपयोग करती हैं।

पंजाब में 1 किलोग्राम चावल के उत्पादन पर लगभग 5000 लीटर जल की खपत होती है और महाराष्ट्र में 1 किलोग्राम चीनी का उत्पादन करने के लिए लगभग 2300 लीटर जल की आवश्यकता पड़ती है,

इसीलिए प्रारंभिक रूप से लगभग 100 वर्ष पहले गन्ने की खेती के केंद्र पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार होते थे, जबकि धान की खेती पूर्वी दक्षिण भारत में होती थी,

जहाँ पर्याप्त वर्षा होती थी लेकिन नई प्रौद्योगिकी और वाणिज्यिक लाभ के चलते महाराष्ट्र जहाँ अपेक्षाकृत कम वर्षा होती है, जैसे स्थानों में भी अधिक सिंचाई अर्थात अधिक जल खपत वाली खेती की जाने लगी है।

गैर नियोजित शहरीकरण के कारण भी जल की समस्या बढ़ती जा रही है। भारत में शहरीकरण में भू जल संभरण तकनीकों का उपयोग नहीं किया जाता है। भूमिगत जल के माध्यम से ही जल की आपूर्ति करने के प्रयास होते रहते हैं।

एक और शहरीकरण ने प्राकृतिक जल संभरण को बर्बाद कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ किसी नई जल संरक्षण तकनीक का विकास भी नहीं किया गया है।

इसके साथ कुशल सीवेज सिस्टम पर भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। वर्तमान में देश के अधिकांश हिस्से में सीवेज को प्राकृतिक जल स्रोतों से जोड़ दिया जाता है, इससे दूनी समस्या उत्पन्न हो जाती है,

एक और सीवेज प्रणाली में उपस्थित जल का पुनर्चक्रण नहीं हो पाता है, जिससे इस जल का द्वितीयक उपयोग किया जा सके, वहीं दूसरी ओर स्थित जल संसाधनों से जोड़कर जल संसाधन पूरी तरीके से दूषित हो जाते हैं अर्थात जल प्रदूषित हो जाता है।

कृषि हेतु बिजली के मूल्य निर्धारण के युक्तिकरण के लिए किसी भी प्रकार द्वारा अतीत में गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं, ड्रिप सिंचाई स्प्रिंकलर जैसी पद्धतियों को उपयोग में नहीं लाया जा रहा है।

जब तक नीतियों को सही रास्ते पर नहीं लाया जाएगा, तब तक जल संकट विकराल रूप धारण करता जाएगा। विश्व में संभवत: इजराइल के पास सबसे अच्छी जल संरक्षण की प्रबंधन प्रणालियाँ उपलब्ध है,

जिनमें ड्रिप सिंचाई स्प्रिंकलर, पद्धति कृषि में उपयोग की जाने के लिए शहरी अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण जैसे कार्यक्रम शामिल होते हैं, किंतु यह भी स्पष्ट है,

कि केवल प्रौद्योगिकी अधिक सफलता नहीं दिला सकती है, इसके लिए सरकारी प्रयास जैसे बिजली का मूल्य निर्धारण में जल के उपयोग पर विशेष दृष्टिकोण को अपनाना पड़ेगा

जल संकट के लिए संभावित प्रयास Possible efforts for water crisis

  1. पंजाब जैसे राज्यों में खरीफ मौसम में मक्का अथवा सोयाबीन जैसे जल विरल फसलों का उत्पादन करने वाले किसानों को कृषि समर्थन मूल्य जैसे ₹15000 प्रति हेक्टेयर देकर प्रोत्साहित किया जा सकता है, जिससे बिजली सब्सिडी में तो बचत होगी ही साथ में भूजल स्तर में अभी ठीक होगा।
  2. पंजाब हरियाणा में धान की खेती के क्षेत्र को कम से कम एक मिलियन हेक्टेयर की कमी लाकर इन्हें पूर्वी भारत की ओर स्थानांतरित करने का कार्य ठीक होगा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत पूर्वी भारत में धान खरीद की सुविधाओं में वृद्धि और पंजाब हरियाणा से इनकी खरीद को हतोत्साहित करने की आवश्यकता जल संकट में सुधार लाएगी।
  3. महाराष्ट्र कर्नाटक पट्टी में गन्ने की खेती को नियंत्रित करना चाहिए इनका विस्तार उत्तर प्रदेश बिहार पट्टी में करने की जरूरत है।
  4. नई किस्मों के विकास के साथ जहाँ पर प्रतिलाभ दर 10.5 % से अधिक होती है, इसकी संभावना बढ़ी है, कि इस पट्टी में गन्ने से इथेनोल के उत्पादन में लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
  5. भारत में वर्ष के एक निश्चित समय में ही वर्षा होती है, जिसके परिणामस्वरूप वर्षा जल जलभराव में परिवर्तित हो जाता है। सरकार एक व्यापक नीति के द्वारा अवसादो को कम करके जलभराव को रोक सकती है, साथ ही प्राकृतिक जल निकायों की जल संरक्षण क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है।
  6. सरकार के द्वारा प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण किया जाना चाहिए तथा भूमि द्वारा जल अवशोषण की दर को बढ़ाने के लिए भी उपाय किए जाने चाहिए।
  7. जल संकट से उबरने के लिए सरकार के द्वारा यह भी कदम उठाया जा सकता है, कि सिंचाई के लिए जल और बिजली की बचत करने वाले किसानों को नगद इनाम देकर उनको प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  8. सरकार द्वारा चलाए जा रहे हैं, वृक्षारोपण कार्यक्रम विभिन्न एनजीओ के द्वारा इस क्षेत्र में जो कार्य किए जा रहे हैं,वह वास्तव में सराहनीय है। इस महान कार्य में देश के प्रत्येक नागरिक को अपना योगदान देना चाहिए और अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना चाहिए।

दोस्तों आपने यहाँ भारत में जल संकट पर निबंध (Essay on Water Crisis in India) पढ़ा। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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