गुरु तेगबहादुर पर निबंध Essay on Guru Tegbahadur

गुरु तेगबहादुर पर निबंध Essay on Guru Tegbahadur 

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख गुरु तेगबहादुर पर निबंध (Essay on Guru Tegbahadur) में। दोस्तों यहाँ पर आप गुरुतेगबहादुर पर निबंध हिंदी में पड़ेंगे।

जिसके अंतर्गत आप गुरु तेगबहादुर का जीवन परिचय, शिक्षाएँ, बलिदान आदि जानेंगे। दोस्तों यहाँ से आप गुरु तेगबहादुर पर निबंध लिखने का आईडिया भी लें सकते है, तो आइये करते है, शुरू यह लेख गुरु तेगबहादुर पर निबंध:-


इसे भी पढ़े:- मंगल पांडे पर निबंध Essay on Mangal Pandey


गुरु तेगबहादुर पर निबंध


गुरु तेग बहादुर पर निबंध 200 शब्द Essay on guru tegbahadur in 200 words 

सिक्खों के नोवें गुरु तेग बहादुर एक महान कवि, योद्धा, तथा शिक्षक थे, जिन्होंने हमेशा ही शांति तथा प्रेम के साथ लोगों को रहने की सीख दी।

ऐसे महान गुरु का जन्म 1 अप्रैल 1621 में पंजाब के अमृतसर नामक स्थान पर हुआ और उनका नाम त्याग मल रखा गया। इनके पिता का नाम गुरु हरगोविंद सिंह था, जो सिक्खों के छठवें गुरु थे

और माता जी का नाम नानकी था। गुरु तेगबहादुर ने हिंदी संस्कृत तथा गुरुमुखी सीखी जबकि घुड़सवारी, तीरदाजी, और तलवारबाजी में भी वे माहिर थे।

गुरु तेगबहादुर को तेग बहादुर नाम करतारपुर में मुगलों के खिलाफ अदम्य साहस का परिचय देने पर उनके पिता से मिला जिसका अर्थ है "बहादुर तलवारधारी" गुरु तेगबहादुर सिक्खों के नौवे गुरु 1664 में बने

तथा 1675  तक रहें। गुरु तेगबहादुर ने हमेशा ही लोगों को सत्य धर्म पर चलने की प्रेरणा दी है और अपनी यात्रायों के दौरान उन्होंने कई आध्यात्मिक तथा रचनात्मक कार्य किये।

गुरु तेगबहादुर ने अपना बलिदान (Secrifiece) उस समय दे दिया जब ओरंगजेब के द्वारा पंडितो तथा हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया जा रहा था।


गुरु तेग बहादुर पर निबंध इन हिंदी Essay on guru tegbahadur in hindi 

दोस्तों यहाँ पर गुरु तेगबहादुर पर निबंध प्रमुख हैडिंग्स के साथ समझाया है, यहाँ से आप गुरु तेग बहादुर पर निबंध इन हिंदी लिखने का आईडिया लें सकते है:-


गुरु तेग बहादुर कौन थे who was guru teg bahadur 

गुरु तेग बहादुर एक महान शिक्षक, कवि तथा महान योद्धा के साथ ही सिक्ख गुरु थे, जिन्होंने अपने जीवन का बलिदान कश्मीरी पंडितों तथा हिन्दुओं के धर्म उनकी परंपरा तथा उनपर पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करते हुए कुर्बान कर दिया था।

सिख धर्म में 10 गुरु हुए हैं, जिनमें से सिक्ख धर्म के प्रथम गुरु गुरु नानक देव हैं, जिन्होंने सिक्ख धर्म की स्थापना की, जबकि सिक्ख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु गुरु गोविंद सिंह है और नौवें स्थान पर नाम आता है

गुरु तेग बहादुर का जो वीर साहसी अन्याय के खिलाफ ना झुकने वाले गुरु थे। उन्होंने सिक्ख धर्म का सम्मान के साथ ही हिंदू और मुसलमानों के धर्म का भी सम्मान किया तथा सिक्ख धर्म के लोगों के अधिकार के लिए तो लड़े ही साथ ही उन्होंने

हिंदू और पंडितों के लोगों के अधिकारों के लिए भी अपनी जान दे दी ऐसे महान गुरु पृथ्वी पर कभी-कभी ही जन्म लेते हैं। ऐसे महान गुरु तेग बहादुर जी का आध्यात्मिक ज्ञान गुरु ग्रंथ साहिब” ग्रंथ में 116 काव्यात्मक भजनों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।


गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय Biography of guru teg bahadur 

गुरु तेग बहादुर का जन्म 1 अप्रैल 1621 में पंजाब के अमृतसर नामक शहर में हुआ था, तथा इनका नाम त्यागमल रखा गया। गुरु तेग बहादुर के पिताजी का नाम गुरु हरगोबिंद था, जो सिक्खों के छठवें गुरु थे,

जबकि इनकी माता जी का नाम नानकी था, जो धार्मिक प्रवृत्ति वाली महिला थी। गुरु तेगबहादुर बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के धनी प्रतिभा के मालिक थे, उन्होंने अपने भाई गुरदास सिंह के द्वारा घर पर ही संस्कृत, हिंदी तथा गुरुमुखी लिपि को सीखा,

जबकि बाबा बुद्ध से इन्हें घुड़सवारी तथा तीरंदाजी की शिक्षा प्राप्त की। गुरु तेगबहादुर को तलवार चलाने की शिक्षा उनके पिताजी गुरु हरगोविंद सिंह द्वारा प्राप्त हुई थी। जब मुगलों द्वारा करतारपुर को घेर लिया गया था,

तब गुरु हरगोविंद के साथ उनके पुत्र त्यागमल ने मात्र 13 वर्ष की उम्र में मुगलों के खिलाफ युद्ध लड़ा और करतारपुर को मुगलों से फिर से प्राप्त करके युद्ध विजय हुए। इस युद्ध में त्यागमल ने अपने अदम्य साहस और वीरता का परिचय दिया,

जिसके कारण उनके पिताजी के द्वारा उन्हें तेग बहादुर का नाम प्राप्त हुआ जिसका अर्थ होता है बहादुर तलवारधारी। गुरु तेगबहादुर का विवाह माता गूजरी से 1932 में हुआ, जिसके बाद उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जो वीर और साहसी था,

जिसका नाम गुरु गोविंद सिंह रखा गया। गुरु तेग बहादुर आध्यात्मिक की तरफ अधिक आकर्षित थे, वे घंटों अकेले बैठे ध्यान में लगे रहते थे। गुरु तेग बहादुर के पिता के कहने पर वे अपने पत्नी

और माता के साथ बकाला (Bakala)  नामक स्थान पर भी रहे। गुरु तेग बहादुर को 20 मार्च 1664 में सिखों का नौवा गुरु बनाया गया और वे इस पद पर 26 नवंबर 1675 ईस्वी तक आसीन रहे।


गुरु तेग बहादुर जी की शिक्षाएँ तथा लेखन Teachings and Writings of Guru Tegh Bahadur Ji

गुरु तेग बहादुर एक महान कवि थे, ज्ञान अध्यात्म से संबंधित कई प्रकार की रचनाएँ शुद्ध भाषा में पदों और साखी के रूप में उनके द्वारा लिखी है, जो गुरुग्रंथ साहब के महला 9 में संग्रहित हैं।

उन्होंने लोगों को एक साथ प्रेम से रहने की सीख दी। उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम करुणा तथा आदर का भाव रखना चाहिए।

गरीबों असहाय लोगों की मदद करना चाहिए, भूखे लोगों को खाना खिलाना चाहिए। गुरु तेग बहादुर ने सिक्ख समाज को एक शांति तथा शक्ति के रूप में इकट्ठा रहकर समाज में होने वाले अन्याय का विरोध करने की सीख दी है। उन्होंने कहा है,

कि ईश्वर एक है और वह हर जगह व्याप्त है इसीलिए हमेशा अच्छे कर्म करते रहिये, उन्होंने हिंदू,मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी को भाई-भाई बताया है और कहा है हमें विषम परिस्थिति में एक-दूसरे की मदद अवश्य करना चाहिए।


गुरु तेग बहादुर की धर्म यात्राएँ Dharma Yatras of Guru Tegh Bahadur

सिक्ख समाज के नौवें गुरु बनने के बाद गुरु तेग बहादुर जी ने सिक्ख धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए कई धार्मिक यात्राएँ शुरू की। गुरु तेग बहादुर ने अपनी धर्म यात्रा आनंदपुर से शुरू की आनंदपुर से होते हुए वह करतारपुर, रोपड़, सैफाबाद से होते

हुए खदल पहुंच गए। इसके बाद वह दमदमा पहुंचे तथा दमदमा से कड़ामानकपुर पहुँचे जहां उन्होंने भाई साधु मूलक दास जी का उद्धार किया।

गुरु तेग बहादुर जी ने अपनी यात्राओं के दौरान लोगों को धर्म उपदेश दिए लोगों को एक साथ शांतिपूर्वक रहने की प्रेरणा दी। गुरु तेग बहादुर ने अपनी यात्राओं के दौरान असम, पटना, प्रयागराज में कई प्रकार के

आध्यात्मिक, सामाजिक तथा रचनात्मक प्रकार के कार्य किए मानव कल्याण के लिए उन्होंने धर्म त्याग प्रेम करुणा दया तथा लोगों को सच्चाई की सीख दी,

जबकि उन्होंने रूढ़िवादियों और अंधविश्वास का घोर विरोध किया, गुरु तेग बहादुर जी ने अपने धर्म यात्रा के दौरान कई जगह पानी के लिए कुएँ खुदवाये तो कई स्थानों पर सराय धर्मशालाऐं बनवाई।


गुरु तेगबहादुर के कुछ श्लोक तथा अर्थ Shlok and Meaning 

गुरु नानक भजु हरि मना
परै ना जम की फास
अर्थ :- गुरु नानक कहते है कि हे मन! तू ईश्वर का भजन कर जिससे यम का फंदा नहीं पड़ेगा।
तरपानो इऊ ही गइयो
लोओ जरा तनु जीति
अर्थ :- जवानी तो यूँ ही चली गयी अब बुढ़ापे ने तन पर कब्ज़ा कर लिया है।
गुरु नानक भजु हरि मना
अउध जातु है बीति
अर्थ :- गुरु नानक कहते है कि हे मन! तू ईश्वर का भजन कर समय बीतता जा रहा है।
बिरधि भइयो सूझै नहीं
कालु पंहुचियो आनि
अर्थ :- बूढ़ा हो गया और होश नहीं है जबकि मौत भी सिर पर आ गई है।
घट - घट में हरि जूँ बसे
संतन कहियो पुकारि
अर्थ :- संत पुरुष पुकार - पुकार यही कहते है, कि ईश्वर घट घट में वास करता है।

 

गुरु तेग बहादुर का बलिदान Guru Tegh Bahadur's Sacrifice

गुरु तेग बहादुर के समय ओरंगजेब का शासन चल रहा था, जिसके दरबार में गीता के श्लोक का अर्थ बताने एक विद्वान ब्राम्हण आता था, किन्तु वह कुछ श्लोको का अर्थ ओरंगजेब को नहीं बताता था।

एक दिन उस ब्राम्हण की तबियत खराब हो गयी इसलिए उसने ओरंगजेब के दरबार में अपने पुत्र को भेज दिया, किन्तु पुत्र को यह नहीं बता पाया, कि वह कुछ श्लोको का अर्थ ओरंगजेब को नहीं बताता है।

ब्राम्हण के पुत्र ने ओरंगजेब को श्लोको का सम्पूर्ण अर्थ बताया जिसे जानकर ओरंगजेब को एहसास हुआ कि हर धर्म अपने आप में महान है, किन्तु वह मुस्लिम धर्म को अधिक महत्व देता था,

इसलिए ओरंगजेब के कुछ चापलूसों ने ओरंगजेब से कह दिया की अगर सभी लोग इस्लाम कुबूल करलें तो केवल इस्लाम धर्म ही बचेगा, जो सबसे महान है, इसलिए ओरंगजेब ने सभी लोगो को इस्लाम कुबूल करने का आदेश दिया और

जो इस्लाम कुबूल ना करें उसे मृत्यु के घाट उतार दिया जायेगा ऐसा निर्णय लिया। इसकारण पंडितो तथा हिन्दु प्रजा से जबरन इस्लाम कुबूल करवाया जाने लगा और उन पर अत्याचार होने लगा।

इस घटना के कारण कुछ कश्मीरी पंडित गुरु तेगबहादुर के पास गए और अपनी इस भयानक समस्या से उन्हें अवगत करवाया। तब गुरु तेगबहादुर ने कहा, कि तुम ओरंगजेब के दरबार में जाओ और कहो अगर गुरु तेगबहादुर इस्लाम कुबूल करलें

तो सभी लोग इस्लाम कुबूल कर लेंगे, किन्तु उन्होंने इस्लाम कुबूल नहीं किया तो ओरंगजेब किसी को इस्लाम कुबूल करने के लिए बाध्य नहीं करेगा।

ओरंगजेब ने यह शर्त मान ली और गुरु तेगबहादुर को बुलाया गया उन्हें इस्लाम कुबूल करने के लिए कई प्रलोभन दिए प्रताड़ित भी किया उनके दो शिष्यों को उनके सामने मौत के घाट उतार दिया,

किन्तु गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम कुबूल नहीं किया। गुरु तेगबहादुर ने ओरंगजेब से कहा तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो सकते, कियोकि इस्लाम अनुमति नहीं देता कि तुम किसी भी अन्य धर्म को जबरन अपने धर्म में परिवर्तित करो।

उनकी इस बात से ओरंगजेब क्रोधित हो गया और उसने चांदनी चौक पर गुरु तेगबहादुर का 24 नवंबर 1675 शीश कलम करने का हुक्म दे दिया। इस प्रकार से धर्म रक्षा के लिए उन्होंने अपना बलिदान दे दिया।


गुरु तेग बहादुर की स्मृति और विरासत The memory and legacy of Guru Tegh Bahadur

गुरु तेगबहादुर ने अपने त्याग बलिदान से सम्पूर्ण सिक्ख जाति के साथ हिन्दु मुस्लिमो का दिल भी जीत लिया था। इसलिए उनकी याद में पंजाब के साथ भारत के कई स्थानों पर विभिन्न गुरुद्वारे बनाए गए,

उनके नाम से कई स्कूल और कॉलेज स्थापित किए गए। पंजाब में कई सड़कों के नाम भी गुरु तेग बहादुर के नाम पर रखे गए है। भारत की राजधानी दिल्ली में में गुरु तेग बहादुर स्मारक भारत सरकार द्वारा

स्थापित किया गया था, जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है, जबकि चांदनी चौक पर गुरुद्वारा सीस गंज साहिब उस स्थान पर बनाया गया है,

जहां गुरु तेग बहादुर का सिर कलम किया गया था और अन्य गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब को उस स्थान के रूप में चिह्नित किया गया है जहां गुरु तेग बहादुर का अंतिम संस्कार किया गया था।


निष्कर्ष Conclusion 

गुरु तेगबहादुर ने सिक्ख होते हुए हिन्दुओं और पंडितो के धर्म की रक्षा करते हुए बलिदान दे दिया उन्होंने हमेशा ही कहा है हम सब एक ही परमात्मा की संतान है।

इसलिए हमें मिलजुलकर एक साथ शांति और प्रेम से रहना चाहिए। ऐसे महान बलिदानी, शिक्षक तथा धर्मात्मा को भारत सहित कई देशों में सम्मान के साथ पूजा जाता है।

दोस्तों आपने यहाँ गुरु तेगबहादुर पर निबंध (Essay on Guru Tegbahadur) पर निबंध पड़ा। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

इसे भी पढ़े:-

  1. कबीर दास पर निबंध Essay on kabirdas
  2. गौतम बुद्ध पर निबंध Essay on gautam buddha
  3. सूरदास पर निबंध Essay on surdas
  4. गोस्वामी तुलसीदास पर निबंध Essay on Tulsidas in hindi 


Post a Comment

और नया पुराने
close