चंद्रगुप्त प्रथम का इतिहास History of Chandragupt Prathan

चंद्रगुप्त प्रथम का इतिहास History of Chandragupt Pratham

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, चंद्रगुप्त प्रथम का इतिहास (History of Chandragupt Pratham) में।

दोस्तों यहाँ पर आप चंद्रगुप्त प्रथम का जीवन परिचय के साथ चन्द्रगुप्त प्रथम की उपलब्धियाँ राज्य विस्तार आदि के बारे में जानेंगे, तो आइये दोस्तों शुरू करते है, यह लेख चंद्रगुप्त प्रथम का इतिहास:-


चंद्रगुप्त प्रथम का इतिहास


चंद्रगुप्त प्रथम का जीवन परिचय Biography of chandragupt pratham 

चंद्रगुप्त गुप्त वंश के एक घटोत्कच नामक शासक का पुत्र तथा गुप्त वंश के संस्थापक श्रीगुप्त का पौत्र था, जो अपने पिता के समान ही वीर पराक्रमी तथा महत्वकांक्षी था। गुप्त वंश के विभिन्न अभिलेखों से यह ज्ञात होता है

कि गुप्त वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक चंद्रगुप्त प्रथम ही था जिसने महाराजाधिराज की उपाधि ग्रहण की थी और यह उपाधि इस बात का प्रमाण है, कि चंद्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का प्रथम शक्तिशाली और स्वतंत्र राजा था।

चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319 ईस्वी से 350 ईस्वी तक शासन किया और गुप्त वंश को अपने पुत्र के रूप में एक महान शासक समुद्रगुप्त दिया जिसे भारत का नेपोलियन भी कहा जाता है।

गुप्त संवत शासन अवधि Gupta era period

जब चंद्रगुप्त ने राज्य ग्रहण किया अर्थात उसका राज्यारोहण राजतिलक हुआ तब उसने एक नवीन संवत की स्थापना की जिसे गुप्त संवत के नाम से जाना गया।चंद्रगुप्त प्रथम ने गुप्त संवत की स्थापना 319-320 ईस्वी में की थी।

नालंदा तथा गया से समुद्रगुप्त काल की सीलें प्राप्त हुई हैं, जिसमें नालंदा की सील 5 गुप्त संवत की और गया की 9 गुप्त संवत की है।

इससे अनुमान लगाया जा सकता है, कि समुद्रगुप्त 319+5 = 324 ईसवी में शासनकाल कर रहा था इस प्रकार से यह कह सकते हैं, कि चंद्रगुप्त प्रथम ने 324 ईसवी तक राज्य किया होगा।

बहुत से विद्वान और इतिहासकारों ने इन सीलों की प्रमाणिकता पर संदेह किया है और चंद्रगुप्त का शासनकाल 335 ईसवी के आसपास माना है, किंतु प्रभावशाली तर्कों और प्रमाणों के आधार पर चंद्रगुप्त प्रथम का शासन काल 324 ईसवी तक माना गया है।


चन्द्रगुप्त प्रथम के सिक्के Coins of Chandragupta I

गुप्त वंश में सबसे पहले चंद्रगुप्त प्रथम के ही स्वर्ण सिक्के प्राप्त होते है, जिन पर शासक और देवियों की आकृतियाँ उत्कीण है। कुछ मुद्राओं पर एक तरफ चंद्रगुप्त का चित्र निर्मित है

उसके बाएं हाथ में ध्वजा और दाएं हाथ में अंगूठी सामने खड़ी रानी कुमार देवी को दे रहा है। उसके दाहिनी तरफ श्रीकुमार देवी और बाईं ओर चंद्रगुप्त लिखा हुआ है। सिक्के के दूसरे पट पर लक्ष्मी का चित्र है

जो शेर पर सवार है। उनके पैर के नीचे कमल है तथा वहीं पर लिच्छवयः लिखा है। ये सिक्के स्वर्ण के हैं और इनका वजन 111 ग्रेन है। 25 स्वर्ण मुद्राएँ ऐसी भी प्राप्त हो चुकी हैं, जिन मुद्राओं के मुख्य भाग पर चंद्रगुप्त प्रथम एवं उसकी रानी कुमार देवी के

चित्र के साथ ही उनके नामों का भी वर्णन दिखता है जबकि पृष्ठ भाग पर धराशाई सिंह अथवा सिंहासन की पीठ पर शुभासीन देवी की आकृति बनी हुई है और इसी पर लिखा है लिच्छवय:।  

ऐसे सिक्कों को लिच्छवि प्रकार, विवाह प्रकार तथा राजारानी प्रकार की मुद्राएँ भी कहा जाता है, कियोकि यह सभी उनके विवाह से सम्बंधित मुद्राएँ है।


चंद्रगुप्त प्रथम के वैवाहिक संबंध Marriage Relations of Chandragupta I

चंद्रगुप्त प्रथम ने राज्य विस्तार तथा राज्य को मजबूती प्रदान करने के लिए वैवाहिक संबंध जैसी रणनीति को अपनाया है। उन्होंने अपने जीवन में लिच्छवि राजकुमारी के साथ विवाह किया था,

जिसके बारे में जानकारी चंद्रगुप्त की स्वर्ण मुद्राओं से प्राप्त होती है। स्वर्ण मुद्राओं को लिच्छवि प्रकार विवाह, प्रकार तथा राजारानी प्रकार की मुद्राएँ भी कहा जाता है। इस विवाह से संबंधित अभी तक 25 स्वर्ण मुद्राएंँ प्राप्त हो चुकी हैं।

इन मुद्राओं के मुख्य भाग पर चंद्रगुप्त प्रथम एवं उसकी रानी कुमार देवी के चित्र के साथ ही उनके नामों का भी वर्णन दिखता है, जबकि पृष्ठ भाग पर धराशाई सिंह अथवा सिंहासन की पीठ पर शुभासीन देवी की आकृति बनी हुई है और इसी पर लिखा है लिच्छवय:।

लिच्छवि राजकुमारी तथा चंद्रगुप्त प्रथम के बारे में और इस विवाह के बारे में जानकारी प्रयाग प्रशस्ति से प्राप्त होती है। इसमें यह भी लिखा है, कि समुद्रगुप्त को महादेवी कुमार देवी के गर्भ से उत्पन्न लिच्छवी दौहित्र के नाम से जाना जाता है।

चंद्रगुप्त प्रथम और लिच्छवी राजकुमारी का विवाह राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस विवाह के बाद चंद्रगुप्त प्रथम सम्राट बन गया था और उसने महाराजाधिराज की उपाधि भी प्राप्त की थी,

क्योंकि राजनीतिक शक्ति के रूप में लिच्छवियों की प्रतिष्ठा भगवान महात्मा बुद्ध के समय से ही चली आ रही है। इसी कारण समुद्रगुप्त ने प्रयाग प्रशस्ति में लिच्छवी दौहित्र कहने में गर्व का अनुभव किया है।


चन्द्रगुप्त प्रथम की उपलब्धियाँ Achievements of Chandragupta I

चन्द्रगुप्त प्रथम एक प्रतापी राजा था जिसने अपने पिता से प्राप्त छोटे से राज्य को विशाल राज्य में परिवर्तित कर दिया। चन्द्रगुप्त प्रथम का इतिहास जानने के मुख्य स्रोत केवल चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा जारी सिक्के है

जो कम संख्या में प्राप्त हुए है। चन्द्रगुप्त प्रथम की मुख्य उपलब्धि लिच्छवी राजकुमारी से विवाह का वैशाली राज्य प्राप्त करना तथा साम्राज्य को शक्तिशाली और विस्तृत करना थी, जबकि चन्द्रगुप्त प्रथम की गुप्त संवत (1919-1920) जारी करना करना भी महान उपलब्धी रहीं है।


राज्य विस्तार State extension

चंद्रगुप्त प्रथम ही गुप्त वंश का वह शासक था, जिसने अपने छोटे से साम्राज्य को मजबूती प्रदान की और उसका अधिक विस्तार करने का भी प्रयास किया।इसके लिए चंद्रगुप्त  प्रथम ने वैवाहिक संबंध नीति अपनाई और सबसे पहले चंद्रगुप्त प्रथम ने

लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया जो एक शक्तिशाली सत्ता के रूप में उस समय शासन कर रहे थे। लिच्छवियों से चंद्रगुप्त प्रथम को वैशाली का राज्य भी प्राप्त हो गया तथा उसकी स्थिति में भी बढ़ोतरी हुई और राज्य विस्तार हुआ।

स्रोतों के आधार पर बताया जाता है, कि चंद्रगुप्त प्रथम का राज्य पश्चिम में प्रयाग जनपद से लेकर पूर्व में मगध अथवा बंगाल के कुछ भागों तक और दक्षिण में मध्य प्रदेश के दक्षिण पूर्वी भाग तक विस्तृत हो चुका था।

दोस्तों यहाँ पर आप चंद्रगुप्त प्रथम का इतिहास (History of Chandragupt Prathan) के साथ अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों को जानेंगे। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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